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बुधवार, 31 जुलाई 2013

ऊधम सिंह

ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 में पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम गाँव में हुआ। ऊधमसिंह की माता और पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। उनके जन्म के दो साल बाद 1901 में उनकी माँ का निधन हो गया और 1907 में उनके पिता भी चल बसे। ऊधमसिंह और उनके बड़े भाई मुक्तासिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। 1917 में उनके भाई का भी निधन हो गया। इस प्रकार दुनिया के ज़ुल्मों सितम सहने के लिए ऊधमसिंह बिल्कुल अकेले रह गए।

शहीद ऊधम सिंह का ऐतिहासिक बयान

जलिया वाले बाग के नरसंहार से भारतीय क्रांतिकारियों में बहुत आक्रोश उठा था और खून का बदला खून से लेने के लिए वह बेचैन हो गये थे। ऊधम सिंह ने इस नरसंहार का बदला लिया। 3 मार्च 1940 को लंदन के रायल सेन्ट्रल एशियन हाल में आयोजित अफगानिस्तान के संबंध में एक परिसवाद में भाग लेने के लिए यह दोनों लोग (ऊधण सिंह और सर माईकल औ डायर) उपस्थित थे। ऊधम सिंह श्रोता के रूप में जेब में पिस्तौल लेकर सभा में जा पहुंचे। वहां जैसे ही डायर भाषण समाप्त कर अपनी कुर्सी की ओर मुड़ा ऊधम सिंह एकदम खड़े हो गये और पिस्तौल निकालकर सर माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दी। डायर वहीं पर ढेर हो गया और सभा में सन्नाटा छा गया। ऊधम सिंह यह कार्य कर भागे नहीं उनको पकड़ लिया गया तथा 2 अप्रैल 1940 को अदालत में पेश किया गया।
उन्होंने न्यायाधीश के सामने बयान देते हुए कहा- मैंने यह हत्या इसलिए की है कि मुझे इस दरिंदे से नफरत थी। उसे जो सजा मिली है वह उसी के काबिल था। वह सच्चे अर्थों में एक अपराधी था। वह मेरे वतन के लोगों की आत्मा की हत्या करना चाहता था। इसलिए मैंने उसकी हत्या कर दी है। अगर आप सच माने तो मैं पूरे 20 वर्षों से बदला लेने के लिये यहां घूम रहा था। मुझे खुशी है कि मैंने अपनी काम पूरा कर लिया है। मैं मौत से नहीं डरता। मैं जवान मौत मरना चाहता हूं। बूढ़ा होकर या अपाहिज होकर मरने का क्या लाभ? मैं अपने देश की जनता के लिए अपने प्राण त्याग रहा हूं देश के लिए प्राण उत्सर्ग कर रहा हूं। क्या लार्ड जेटलैंड भी मर गये हैं। उनको जरूर मारना चाहिए। मैंने अपनी आंखों से देखा है कि अंग्रेजी हुकूमत से भारत की जनता दुखी है, भूख से मर रही है। मैं इसके विरोध में अपनी यह प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा हूं। यह मेरार् कत्तव्य है। इससे ज्यादा सम्मान मुझे क्या दिया जा सकता है कि अपनी प्यारी मातृभूमि के लिए मैं मृत्यु को वरण करूं। जब न्यायाधीश ने उनका नाम पूछा तो ऊधम सिंह ने जवाब दिय। मेरा नाम ऊधम सिंह नहीं है। मेरा नाम राम मुहम्मद सिंह आजाद हैं। उन्होंने राम शब्द का प्रयोग हिन्दुओं के लिए, मोहम्मद शब्द का प्रयोग मुसलमानों के लिए, सिंह का प्रयोग सिखों के लिए और आजाद शब्द का प्रयोग अपने देश की आजादी के लिए किया था। जब ऊधम सिंह लंदन जेल में थे उस समय जब कोई कैदी उन्हें नाम से बुलाता था तो उन पर इसकी तुरंत प्रतिक्रिया होती थी।
जेल से लिखे हुए अपने एक पत्र में उन्होंने कहा था, ‘मैं कैदी नहीं हूं, मैं तो इंग्लैंड की महारानी का सरकारी मेहमान हूं। ऊधम सिंह ने डायर को मारा, कबूल किया उनको फांसी की सजा सुनवाई गयी। अंत में उन्हें 31 जुलाई 1940 को फांसी दे दी गयी। एक क्रांतिकारी का अंत हो गया पर भारतीय आज भी उन्हें बड़ी इज्जत से याद करते हैं।
Photo: ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 में पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम गाँव में हुआ। ऊधमसिंह की माता और पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। उनके जन्म के दो साल बाद 1901 में उनकी माँ का निधन हो गया और 1907 में उनके पिता भी चल बसे। ऊधमसिंह और उनके बड़े भाई मुक्तासिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। 1917 में उनके भाई का भी निधन हो गया। इस प्रकार दुनिया के ज़ुल्मों सितम सहने के लिए ऊधमसिंह बिल्कुल अकेले रह गए।

शहीद ऊधम सिंह का ऐतिहासिक बयान

जलिया वाले बाग के नरसंहार से भारतीय क्रांतिकारियों में बहुत आक्रोश उठा था और खून का बदला खून से लेने के लिए वह बेचैन हो गये थे। ऊधम सिंह ने इस नरसंहार का बदला लिया। 3 मार्च 1940 को लंदन के रायल सेन्ट्रल एशियन हाल में आयोजित अफगानिस्तान के संबंध में एक परिसवाद में भाग लेने के लिए यह दोनों लोग (ऊधण सिंह और सर माईकल औ डायर) उपस्थित थे। ऊधम सिंह श्रोता के रूप में जेब में पिस्तौल लेकर सभा में जा पहुंचे। वहां जैसे ही डायर भाषण समाप्त कर अपनी कुर्सी की ओर मुड़ा ऊधम सिंह एकदम खड़े हो गये और पिस्तौल निकालकर सर माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दी। डायर वहीं पर ढेर हो गया और सभा में सन्नाटा छा गया। ऊधम सिंह यह कार्य कर भागे नहीं उनको पकड़ लिया गया तथा 2 अप्रैल 1940 को अदालत में पेश किया गया।
उन्होंने न्यायाधीश के सामने बयान देते हुए कहा- मैंने यह हत्या इसलिए की है कि मुझे इस दरिंदे से नफरत थी। उसे जो सजा मिली है वह उसी के काबिल था। वह सच्चे अर्थों में एक अपराधी था। वह मेरे वतन के लोगों की आत्मा की हत्या करना चाहता था। इसलिए मैंने उसकी हत्या कर दी है। अगर आप सच माने तो मैं पूरे 20 वर्षों से बदला लेने के लिये यहां घूम रहा था। मुझे खुशी है कि मैंने अपनी काम पूरा कर लिया है। मैं मौत से नहीं डरता। मैं जवान मौत मरना चाहता हूं। बूढ़ा होकर या अपाहिज होकर मरने का क्या लाभ? मैं अपने देश की जनता के लिए अपने प्राण त्याग रहा हूं देश के लिए प्राण उत्सर्ग कर रहा हूं। क्या लार्ड जेटलैंड भी मर गये हैं। उनको जरूर मारना चाहिए। मैंने अपनी आंखों से देखा है कि अंग्रेजी हुकूमत से भारत की जनता दुखी है, भूख से मर रही है। मैं इसके विरोध में अपनी यह प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा हूं। यह मेरार् कत्तव्य है। इससे ज्यादा सम्मान मुझे क्या दिया जा सकता है कि अपनी प्यारी मातृभूमि के लिए मैं मृत्यु को वरण करूं। जब न्यायाधीश ने उनका नाम पूछा तो ऊधम सिंह ने जवाब दिय। मेरा नाम ऊधम सिंह नहीं है। मेरा नाम राम मुहम्मद सिंह आजाद हैं। उन्होंने राम शब्द का प्रयोग हिन्दुओं के लिए, मोहम्मद शब्द का प्रयोग मुसलमानों के लिए, सिंह का प्रयोग सिखों के लिए और आजाद शब्द का प्रयोग अपने देश की आजादी के लिए किया था। जब ऊधम सिंह लंदन जेल में थे उस समय जब कोई कैदी उन्हें नाम से बुलाता था तो उन पर इसकी तुरंत प्रतिक्रिया होती थी।
जेल से लिखे हुए अपने एक पत्र में उन्होंने कहा था, ‘मैं कैदी नहीं हूं, मैं तो इंग्लैंड की महारानी का सरकारी मेहमान हूं। ऊधम सिंह ने डायर को मारा, कबूल किया उनको फांसी की सजा सुनवाई गयी। अंत में उन्हें 31 जुलाई 1940 को फांसी दे दी गयी। एक क्रांतिकारी का अंत हो गया पर भारतीय आज भी उन्हें बड़ी इज्जत से याद करते हैं।

शनिवार, 6 जुलाई 2013

हिन्दू नक्षत्र निरीक्षण केंद्र

क्या आप जानते हैं कि.... आजकल दिल्ली में हम जिसे कुतुबमीनार कहते हैं ...और .... उसे लूले कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाया गया समझते हैं.... दरअसल वह...... महाराजा विक्रमादित्य के राज्यकाल में.... राजा विक्रमादित्य द्वारा बनवाया गया .... ""हिन्दू नक्षत्र निरीक्षण केंद्र"" है..... जिसका ""असली नाम ध्रुव स्तम्भ"" है...!

परन्तु ... प्राचीन इतिहासकारों द्वारा मूर्खतावश.... और, आधुनिक काल में ""मुस्लिम तुष्टिकरण हेतु"" .... कुतुबमीनार को .... उस लूले कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाया गया.... कहा जाता है.....!

प्राचीन इतिहासकारों द्वारा .... बिना तथ्यों की जानकारी जुटाए ही .... कतिपय नामों की समानता के कारण ... ऐसा मान लिया गया कि..... कुतुबमीनार ... कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाया गया है...!

यह बहुत कुछ इसी प्रकार की मूर्खता है .... जैसे कि... कोई यह कहना शुरू कर दे कि..... आर्यभट्ट नामक उपग्रह .... आर्यभट्ट ने ही भेजा था.... अथवा .... सभी शहरों में मौजूद ... MG ROAD (महात्मा गाँधी रोड )... महात्मा गाँधी ने बनवाया था....!

जहाँ तक.... उस लूले गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक की बात है तो..... वो लुटेरा और जेहादी गोरी का गुलाम था.... और, वो गोरी के साथ ही भारत में जिहाद चलाने आया था..... जिसे बाद में भारत का प्रभारी बना कर ...स्थायी तौर पर भारत में जिहाद चलाने की अनुमति दे दी गयी थी..... जिस दौरान उसने .... भारत में सिर्फ लूट-पाट मचाई और.. मंदिरों को तोडा...!

हुआ दरअसल ये था कि.... जब वो लूला कुतुबुद्दीन .... जिहाद करते करते दिल्ली पहुंचा तो....... वहां इतना बड़ा और खुबसूरत स्तम्भ देखकर ..... उस लूले का मुंह खुला का खुला रह गया.... और, उसने अपने साथियों से पूछा कि .... ये क्या है...?????

इस पर.... उस लूले को अरबी में बताया गया ( क्योंकि, उस लूले को निपट मूर्ख होने के कारण हिंदी नहीं आती थी ) कि..... हुजुर ... ये ""क़ुतुब मीनार""" ... अर्थात , उत्तरी धुव का निरीक्षण केंद्र है ...!

बस यहीं से..... वो लूला और उसके उज्जड साथी इसे ... क़ुतुबमीनार- कुतुबमीनार कहने लगे .... !

उस पर भी ..... उस लूले कुतुबुद्दीन ऐबक ने ... ये बात खुद से कहीं भी नहीं कहा है कि..... कुतुबमीनार उसने बनवाया है..... लेकिन.... उसने ये जरुर कबूल किया है कि..... उसने इस स्तम्भ के चारों और बनी 27 मंदिरों को ध्वस्त कर दिया है !

लेकिन.... बाद के इतिहासकारों ने नामों में समानता देख कर .... बिना कुछ सोचे समझे ही ये नतीजा निकल लिया कि..... इस कुतुबमीनार को कुतुबुद्दीन ऐबक ने ही बनवाया होगा....!

अब अगर...... इतिहासकारों की बातों को छीलना शुरू किया जाए तो..... सबसे पहला प्रश्न यही है कि.....

अगर .... उस लूले कुतुबुद्दीन ने क़ुतुब मीनार बनाई..... तो कब ... क्योंकि.... कुतुबुद्दीन तो मात्र 4 साल ही भारत में जिहाद कर पाया था..... और...क्या कुतुबुद्दीन ने अपने निहायत ही छोटे राज्यकाल (1206 से 1210 ) में ... इतने बड़े मीनार का निर्माण करा सकता था .... जबकि पहले के दो वर्ष उसने लाहौर में विरोधियों को समाप्त करने में बिताये .....और, 1210 में भी मरने के पहले भी वह लाहौर में था ?????

फिर भी कुछ लोग अपनी थेथारोलोजी का इस्तेमाल करते हुए बोलते हैं कि.... लूले ने इसे 1193 AD में बनाना शुरू किया और कुतुबुद्दीन ने सिर्फ एक ही मंजिल बनायीं .. जबकि, उसके ऊपर के तीन मंजिलें उसके परवर्ती बादशाह इल्तुतमिश ने बनाई और ...... उसके ऊपर की शेष मंजिलें बाद में बनी....!

यदि उनकी ही बातों को माना जाए तो....अगर.... 1193 में कुतुबुद्दीन ने .....मीनार बनवाना शुरू किया होता तो ..... उसका नाम "बादशाह गोरी " के नाम पर.... "गोरी मीनार", या "गजनी मीनार " ऐसा ही कुछ होता ......... या कि ........ एक "लूले गुलाम कुतुबुद्दीन" के नाम पर .......क़ुतुब मीनार....????

अब कुछ लोगों ने ये भी कहना शुरू कर दिया है कि..... ऐबक ने नमाज़ समय अजान देने केलिए यह मीनार बनवाई थी...... तो क्या उतनी ऊंचाई से किसी की आवाज़ नीचे तक आ भी सकती है ?????
और फिर क्या.... बगल में ही मौजूद लौह स्तम्भ को ..... अजान के समय .... अल्लाह को बैठने के लिए बनाया गया था....??????

असल में.....सच तो यह है कि.... जिस स्थान में क़ुतुब परिसर है ....... उसे मेहरौली कहा जाता है,..... और यह मेहरौली ........वराहमिहिर के नाम पर बसाया गया था .....जो सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में एक और .. एक बहुत बड़े खगोलशास्त्री एवं भवन निर्माण विशेषज्ञ थे !

उन्होंने इस परिसर में मीनार यानि स्तम्भ के चारों ओर नक्षत्रों के अध्ययन के लिए........ 27 कलापूर्ण परिपथों का निर्माण करवाया था.... और, .इन परिपथों के स्तंभों पर सूक्ष्मकारीगरी के साथ देवी देवताओं की प्रतिमाएं भी उकेरी गयीं थीं जो नष्ट किये जाने के बाद भी कहीं कहीं दिख ही जाती हैं... ( चित्र संलग्न )

इसका दूसरा सबसे बड़ा प्रमाण..... उसी परिसर में खड़ा लौह स्तम्भ है........जिस पर खुदा हुआ ब्राम्ही भाषा का लेख.........जिसमे लिखा है कि..... यह स्तम्भ जिसे गरुड़ ध्वज कहा गया है... सम्राट चन्द्र गुप्त विक्रमादित्य (राज्य काल 380-414 ईसवीं ) द्वारा स्थापित किया गया था..... और, यह लौहस्तम्भ आज भी विज्ञान के लिए आश्चर्य की बात है ... क्योंकि... आज तक इसमें जंग नहीं लगा...
उसी महान सम्राट के दरबार में महान गणितज्ञ आर्य भट्ट.......खगोल शास्त्री एवं भवन निर्माण विशेषज्ञ वराह मिहिर......वैद्य राजब्रम्हगुप्त आदि हुए.......!

तो ये बहुत ही सामान्य ज्ञान कि बात है कि....ऐसे प्रतापी राजा के राज्य काल ....... जिसमे लौह स्तम्भ स्थापित हुआ ..........तो क्या जंगल में बिना कारण के सिर्फ अकेला स्तम्भ बना दिया गया होगा......??????

सोचो हिन्दुओं ...... आपके साथ क्या खेल खेला जा रहा है...... कि.... विध्वंसक को ही आपका निर्माता बना कर प्रस्तुत किया जा रहा है....!

क्या.... तुष्टिकरण का इस से भी ज्यादा घिनौना खेल ... दुनिया के किसी भाग में खेला जा सकता है....?????

जागो हिन्दुओं.... और, पहचानो अपने आपको ......

अन्यथा अभी तक तुम्हारा तो सिर्फ ऐतिहासिक धरोहर ही लूटा गया है..... .. कल तुम्हारे घर को लूटने की तैयारी है ....!

गुरुवार, 27 जून 2013

नालंदा विश्वविद्यालयन को क्यों जलाया गया था..? जानिए सच्चाई ...??

एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव वाला तुर्क लूटेरा था....बख्तियार खिलजी.
इसने ११९९ इसे जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया।
उसने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित
कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था.
एक बार वह बहुत बीमार पड़ा उसके हकीमों ने
उसको बचाने की पूरी कोशिश कर ली ...
मगर वह ठीक नहीं हो सका.
किसी ने उसको सलाह दी...
नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के
प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र
जी को बुलाया जाय और उनसे भारतीय
विधियों से इलाज कराया जाय
उसे यह सलाह पसंद नहीं थी कि कोई भारतीय
वैद्य ...
उसके हकीमों से उत्तम ज्ञान रखते हो और
वह किसी काफ़िर से .उसका इलाज करवाए
फिर भी उसे अपनी जान बचाने के लिए
उनको बुलाना पड़ा
उसने वैद्यराज के सामने शर्त रखी...
मैं तुम्हारी दी हुई कोई दवा नहीं खाऊंगा...
किसी भी तरह मुझे ठीक करों ...
वर्ना ...मरने के लिए तैयार रहो.
बेचारे वैद्यराज को नींद नहीं आई... बहुत
उपाय सोचा...
अगले दिन उस सनकी के पास कुरान लेकर
चले गए..
कहा...इस कुरान की पृष्ठ संख्या ... इतने से
इतने तक पढ़ लीजिये... ठीक हो जायेंगे...!
उसने पढ़ा और ठीक हो गया ..
जी गया...
उसको बड़ी झुंझलाहट
हुई...उसको ख़ुशी नहीं हुई
उसको बहुत गुस्सा आया कि ... उसके
मुसलमानी हकीमों से इन भारतीय
वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है...!
बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने
के बदले ...उनको पुरस्कार देना तो दूर ...
उसने नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग
लगवा दिया ...पुस्तकालयों को ही जला के
राख कर दिया...!
वहां इतनी पुस्तकें थीं कि ...आग
लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकें धू धू करके
जलती रहीं
उसने अनेक धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार
डाले.
आज भी बेशरम सरकारें...उस नालायक
बख्तियार खिलजी के नाम पर रेलवे स्टेशन
बनाये पड़ी हैं... !
उखाड़ फेंको इन अपमानजनक नामों को...
मैंने यह तो बताया ही नहीं... कुरान पढ़ के वह
कैसे ठीक हुआ था.
हम हिन्दू किसी भी धर्म ग्रन्थ को जमीन पर
रख के नहीं पढ़ते...
थूक लगा के उसके पृष्ठ नहीं पलटते
मिएँ ठीक उलटा करते हैं..... कुरान के हर पेज
को थूक लगा लगा के पलटते हैं...!
बस...
वैद्यराज राहुल श्रीभद्र जी ने कुरान के कुछ
पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप
लगा दिया था...
वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज चाट
गया...ठीक हो गया और उसने इस एहसान
का बदला नालंदा को नेस्तनाबूत करके दिया

शहीद उधम सिंह की कहानी जरूर पढ़ें !

मित्रो सन 1919 को एक करूर अंग्रेज़ अधिकारी भारत मे आया था जिसका नाम था डायर ! अमृतसर मे उसकी पोस्टिंग की गई थी और उसने एक रोलेट एक्ट नाम का कानून बनाया जिसमे नागरिकों के मूल अधिकार खत्म होने वाले थे ! और नागरिकों की जो थोड़ी बहुत बची कूची आजादी थी वो भी अंग्रेज़ो के पास जाने वाली थी !

इस रोलेट एक्ट का विरोध करने के लिए 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग मे एक बड़ी सभा आयोजित की गई थी ! जिसमे 25000 लोग शामिल हुए थे ! उस बड़ी सभा मे डायर ने अंधाधुंध गोलियां चलवायी थी ! अगर आप मे से किसी ने पुलिस या सेना मे नोकरी की हो तो आप अंदाजा लगा सकते हैं ! 15 मिनट के अंदर 1650 राउंड गोलियां चलवाई थी डायर ने ! और 3000 क्रांतिकारी वहीं तड़प तड़प के मर गए थे !

आप मे से किसी ने जलियाँवाला बाग देखा हो तो वहाँ अंदर जाने और बाहर आने के लिए एक ही दरवाजा है वो भी चार दीवारी से घिरा हुआ है और दरवाजा भी मुश्किल से 4 से 5 फुट चोड़ा है ! उस दरवाजे के बाहर डायर ने तोप लगवा दी थी ताकि कोई निकल के बाहर न जा पाये ! और अंदर उसके दो कुएं है जिसको अंधा कुंआ के नाम से जाना जाता है ! 1650 राउंड गोलियां जब चलायी गई ! जो लोग गोलियों के शिकार हुये वो तो वही शहीद हो गए और जो बच गए उन्होने ने जान बचाने के लिए कुएं मे छलांग लगा दी और कुंआ लाशों से भर गया !

और 15 मिनट तक गोलियां चलाते हुए डायर वहाँ से हँसते हुए चला गया और जाते हुये अमृतसर की सड्को पर जो उसे लोग मिले उन्हे गोलियां मार कर तोप के पीछे बांध कर घसीटता गया ! इसके लिए उसे अँग्रेजी संसद से ईनाम मिला था उसका प्रमोशन कर दिया गया था और उसको भारत से लंदन भेज दिया गया था और बड़े ओहदे पर !

उधम सिंह उस वक्त 11 साल के थे और ये ह्त्याकांड उन्होने अपनी आंखो से देखा था ! और उन्होने संकल्प लिया था संकल्प ये था जिस तरह डायर ने मेरे देश वासियो को इतनी क्रूरता से मारा हैं इस डायर को मैं जिंदा नहीं छोड़ूँगा ! यही मेरी ज़िंदगी का आखिरी संकल्प हैं ! आपको एक और बात मालूम होगी उधम सिंह की वह घर से गरीब थे माता पिता का साया उनसे उठ चुका था आनाथ आश्रम मे पल कर बड़े हुये थे ! बड़े भाई थे उनकी मौत हो चुकी थी किसी बीमारी से !

अब आर्थिक हालत अच्छे नहीं थे संकल्प ले लिया था डायर को मारने का ! उसके लिए योजना बनाई लंदन जाने की ! उसके लिए पैसे नहीं थे ! तो उन्होने सोचा मैं किसी आगे हाथ फैलाऊँ इससे अच्छा खुद मेहनत-मजदूरी करूँ ! फिर उन्होने carpenter (लकड़ी का काम किया) ! और कुछ पैसे कमा अमेरिका गए अमेरिका से फिर लंदन गए ! लंदन जाकर फिर किसी होटल मे नोकरी की पानी पिलाने की ताकि कुछ पैसे इकठे हो और उससे बंदूक खरीदी जा सके !

और ये सब काम करते करते शहीदे आजम उधम सिंह को 21 साल लग गए पूरे 21 साल ! 1919 मे जलियाँवाला बाग हत्याकांड हुआ था और 1940 मे पूरे 21 साल बाद उन्होने अपना संकल्प पूरा किया 21 साल तक वो मेहनत करते रहे,इधर उधर भागते रहे ,जिंदा रहे सिर्फ अपना संकल्प पूरा करने ले लिए !

अंत 1940 मे Caxton Hall एक जगह है लंदन मे वहाँ डायर को सम्मान दिया जा रहा था मालाएँ आदि पहनाई जा रही थी उधम सिंह वहाँ पहुंचे थे और अपने साथ लाई किताब मे छिपी बंदूक निकाल एक साथ 3 गोलियां डायर के सीने मे उतार दी ! 3 गोलियां मार कर एक ही वाकय कहा था कि आज मैंने 21 साल पहले लिया अपना संकल्प पूरा कर लिया है ! और मैं अब इसके बाद एक मिनट जिंदा नहीं रहना चाहता ! तो जब उन्होने बंदूक अंग्रेज़ अधिकारी को सोंपी तो अंग्रेज़ अधिकारी के हाथ कांप रहे थे ! उसको लग रहा था कहीं मुझे भी न मार दे ! तो उधम सिंह ने कहा घबराओ मत मेरे तुमसे कोई दुश्मनी नहीं है मेरी तो डायर से दुश्मनी थी जिसने मेरे देश के 3000 बेकसूर लोगो को तड़पा -तड़पा कर मारा था !

तो मित्रो हमारे क्रांतिकारियों का इतना ऊंचा आदर्श था जो संकल्प लिया है उसी की पूर्ति के लिए जीवन लगा देना है उसके लिए बेशक 10 साल लगे 15 साल लगे ! 20 लगे 21 साल लगे ! ये प्रेरणा हम सबको शहीदे आजम उधम सिंह के जीवन से लेनी चाहिए ! माँ भारती के इस पुत्र को दिल से सलाम !


वन्देमातरम !

मंगलवार, 25 जून 2013

प्राचीन भारतीय विज्ञानं के सन्दर्भ में सुरेशसोनी(suresh soni) जी का विद्युत् शास्त्र से सम्बंधित लेख



अगस्त्य संहिता का विद्युत्‌ शास्त्र
राव साहब कृष्णाजी वझे ने १८९१ में पूना से इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की। भारत में विज्ञान संबंधी ग्रंथों की खोज के दौरान उन्हें उज्जैन में दामोदर त्र्यम्बक जोशी के पास अगस्त्य संहिता के कुछ पन्ने मिले। यह शक संवत्‌ १५५० के करीब के थे। आगे चलकर इस संहिता के पन्नों में उल्लिखित वर्णन को पढ़कर नागपुर में संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे डा। एम.सी. सहस्रबुद्धे को आभास हुआ कि यह वर्णन डेनियल सेल से मिलता-जुलता है। अत: उन्होंने नागपुर में इंजीनियरिंग के प्राध्यापक श्री पी.पी. होले को वह दिया और उसे जांचने को कहा। अगस्त्य का सूत्र निम्न प्रकार था-
संस्थाप्य मृण्मये पात्रेताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌।
छादयेच्छिखिग्रीवेनचार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:।
संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥
अगस्त संहिताइसका तात्पर्य था, एक मिट्टी का पात्र (कठ्ठद्धद्यण्ड्ढद द्रदृद्य) लें, उसमें ताम्र पट्टिका (क्दृद्रद्रड्ढद्ध च्ण्ड्ढड्ढद्य) डालें तथा शिखिग्रीवा डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (ध्र्ड्ढद्य द्मठ्ठध्र्‌ क़्द्वद्मद्य) लगायें, ऊपर पारा (थ्र्ड्ढद्धड़द्वद्धन्र्‌) तथा दस्त लोष्ट (न्न्त्दड़) डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो, उससे मित्रावरुणशक्ति का उदय होगा।
उपर्युक्त वर्णन के आधार पर श्री होले तथा उनके मित्र ने तैयारी चालू की तो शेष सामग्री तो ध्यान में आ गई, परन्तु शिखिग्रीवा समझ में नहीं आया। संस्कृत कोष में देखने पर ध्यान में आया कि शिखिग्रीवा याने मोर की गर्दन। अत: वे और उनके मित्र बाग गए तथा वहां के प्रमुख से पूछा, क्या आप बता सकते हैं, आपके झ्दृदृ में मोर कब मरेगा, तो उसने नाराज होकर कहा क्यों? तब उन्होंने कहा, एक प्रयोग के लिए उसकी गरदन की आवश्यकता है। यह सुनकर उसने कहा ठीक है। आप एक एप्लीकेशन दे जाइये। इसके कुछ दिन बाद एक आयुर्वेदाचार्य से बात हो रही थी। उनको यह सारा घटनाक्रम सुनाया तो वे हंसने लगे और उन्होंने कहा, यहां शिखिग्रीवा का अर्थ मोर की गरदन नहीं अपितु उसकी गरदन के रंग जैसा पदार्थ कॉपरसल्फेट है। यह जानकारी मिलते ही समस्या हल हो गई और फिर इस आधार पर एक सेल बनाया और डिजीटल मल्टीमीटर द्वारा उसको नापा।
उसका ग्र्द्रड्ढद क्त्द्धड़द्वत्द्य ध्दृथ्द्यठ्ठढ़ड्ढ था १।३८ ज्दृथ्द्यद्म और च्ण्दृद्धद्य क्त्द्धड़द्वत्द्य क्द्वद्धद्धड्ढदद्य था २३ ग्त्थ्थ्त्‌ ठ्ठथ्र्द्रड्ढद्धड्ढद्म।प्रयोग सफल होने की सूचना डा. एम.सी. सहस्रबुद्धे को दी गई। इस सेल का प्रदर्शन ७ अगस्त, १९९० को स्वदेशी विज्ञान संशोधन संस्था (नागपुर) के चौथे वार्षिक सर्वसाधारण सभा में अन्य विद्वानों के सामने हुआ। तब विचार आया कि यह वर्णन इलेक्ट्रिक सेल का है। पर इसका आगे का संदर्भ क्या है इसकी खोज हुई और आगे ध्यान में आया ऋषि अगस्त ने इसके आगे की भी बातें लिखी हैं-
अनने जलभंगोस्ति प्राणोदानेषु वायुषु।
एवं शतानां कुंभानांसंयोगकार्यकृत्स्मृत:॥
अगस्त संहिताअगस्त्य कहते हैं सौ कुंभों की शक्ति का पानी पर प्रयोग करेंगे, तो पानी अपने रूप को बदल कर प्राण वायु ( ग्र्न्न्र्ढ़ड्ढद) तथा उदान वायु (क्तन्र्ड्डद्धदृढ़ड्ढद) में परिवर्तित हो जाएगा। उदान वायु को वायु प्रतिबन्धक वस्त्र में रोका जाए तो यह विमान विद्या में काम आता है।वायुबन्धकवस्त्रेणनिबद्धो यानमस्तकेउदान : स्वलघुत्वे बिभर्त्याकाशयानकम्‌। (अगस्त्य संहिता शिल्प शास्त्र सार)राव साहब वझे, जिन्होंने भारतीय वैज्ञानिक ग्रंथ और प्रयोगों को ढूंढ़ने में अपना जीवन लगाया, उन्होंने अगस्त्य संहिता एवं अन्य ग्रंथों के आधार पर विद्युत भिन्न-भिन्न प्रकार से उत्पन्न होती हैं, इस आधार उसके भिन्न-भिन्न नाम रखे-(१) तड़ित्‌-रेशमी वस्त्रों के घर्षण से उत्पन्न।(२) सौदामिनी-रत्नों के घर्षण से उत्पन्न।(३) विद्युत-बादलों के द्वारा उत्पन्न।(४) शतकुंभी-सौ सेलों या कुंभों से उत्पन्न।(५) हृदनि- हृद या स्टोर की हुई बिजली।(६) अशनि-चुम्बकीय दण्ड से उत्पन।अगस्त्य संहिता में विद्युत्‌ का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग के लिए करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबा या सोना या चांदी पर पालिश चढ़ाने की विधि निकाली। अत: अगस्त्य को कुंभोद्भव (एठ्ठद्यद्यड्ढद्धन्र्‌ एदृदड्ढ) कहते हैं।
कृत्रिमस्वर्णरजतलेप: सत्कृतिरुच्यते।
-शुक्र नीतियवक्षारमयोधानौ सुशक्तजलसन्निधो॥
आच्छादयति तत्ताम्रंस्वर्णेन रजतेन वा।
सुवर्णलिप्तं तत्ताम्रंशातकुंभमिति स्मृतम्‌॥
५ (अगस्त्य संहिता)अर्थात्‌-कृत्रिम स्वर्ण अथवा रजत के लेप को सत्कृति कहा जाता है। लोहे के पात्र में सुशक्त जल अर्थात तेजाब का घोल इसका सानिध्य पाते ही यवक्षार (सोने या चांदी का नाइट्रेट) ताम्र को स्वर्ण या रजत से ढंक लेता है। स्वर्ण से लिप्त उस ताम्र को शातकुंभ अथवा स्वर्ण कहा जाता है

मोतीलाल (वेश्यालय मालिक) व नेहरू(nehru) का जन्म वेश्यालय में हुआ था.


मोतीलाल (वेश्यालय मालिक) व नेहरू का जन्म वेश्यालय में हुआ था.
मोतीलाल ( भारत के प्रथम प्रधान मंत्री का पिता ) अधिक पढ़ा लिखा व्यक्ति नहीं था. कम उम्र में विवाह के बाद जीविका की खोज में वह इलाहबाद आ गया था. हमें यह पता नहीं की निश्चित रूप से वह इलाहबाद में कहाँ आकर बसा होगा ,किन्तु हम विश्वास नहीं कर सकते की उसके बसने का स्थान मीरगंज रहा होगा ,जहाँ तुर्क व मुग़ल अपहृत हिन्दू महिलाओं को अपने मनोरंजन के लिए रखते थे. हम एसा इस लिए कह रहे हैं की अब हम अच्छी तरह जान चुके हैं की मोतीलाल अपनी दूसरी पत्नी के साथ मीरगंज में वेश्याओं के इलाके में रहा था. पहली पत्नी एक पुत्र के होने के बाद मर गयी थी. कुछ दिन पश्चात उसका पुत्र भी मर गया .जिसके बाद वह कश्मीर लोट गया. जहाँ पर एक बार फिर तीसरा विवाह किया. और तीसरी पत्नी के साथ फिर से इलाहबाद लोट आया. उसने जीविका चलने के लिए वेश्यालय चलने का निश्चय किया. दिन के समय मोतीलाल कचहरी में मुख्तार का काम करता था.उसी उच्च न्यायलय में एक प्रसिद्द वकील मुबारक अली था जिसकी वकालत बहुत चलती थी. इशरत मंजिल के नाम से उसका एक मकान था.
कचहरी से मोतीलाल पैदल ही अपने घर लोटता था. मुबारक अली भी शाम को रंगीन बनाने के लिए मीरगंज आता रहता था. एक दिन मीरगंज में ही मोतीलाल मुबारक अली से मिला और अपनी नई पत्नी के साथ रात बिताने का निमंत्रण दिया. सोदा पट गया.और इस प्रकार मोतीलाल के सम्बन्ध मुबारक अली से बन गए. दोनों ने इटावा की विधवा रानी को उसका राज्य वापस दिलाने के लिए जमकर लूटा. उस समय लगभग १० लाख की फीस ली. और आधी आधी बाँट ली. यही से मोतीलाल की किस्मत का सितारा बदल गया.
इसी बीच मोतीलाल की बीबी गर्भवती हो गयी. मुबारक ने माना की बच्चा उसी की नाजायज ओलाद है.मोतीलाल ने मुबारक से भावी संतान के लिए इशरत महल में स्थान माँगा. किन्तु मुबारक ने मना कर दिया. किन्तु जच्चा-बच्चा का सारा खर्च वहन किया. अंत में भारत का भावी प्रधान मंत्री मीरगंज के वेश्यालय में पैदा हुआ. जैसे ही जवाहर पी एम् बना वैसे ही तुरंत उसने मीरगंज का वह मकान तुडवा दिया ,और अफवाह फैला दी की वह आनद भवन (इशरत महल)में पैदा हुआ था जबकि उस समय आनंद भवन था ही नहीं.
मुबारक का सम्बन्ध बड़े प्रभुत्वशाली मुसलमानों से था. अवध के नवाब को जब पता चला की मुबारक का एक पुत्र मीरगंज के वेश्यालय में पल रहा है तो उसने मुबारक से उसे इशरत महल लाने को कहा. और इस प्रकार नेहरू की परवरिश इशरत महल में हुई. और इसी बात को नेहरू गर्व से कहता था की उसकी शिक्षा विदेशों में हुई,इश्लाम के तोर तरीके से उसका विकास हुआ.और हिन्दू तो वह मात्र दुर्घटनावश ही था.
(पुस्तक -नेहरु खान वंश ,प्रकाशक-मानव रक्षा संघ )इसे नेट पर पढने के लिएwww.aryavrt.com साईट देखें.

राष्ट्र विरोधी व् हिन्दू विरोधी था गाँधी का असहयोग आन्दोलन



मह्रिषी अरविन्द ने १९०९ में कहा था "प्रारंभ से ही कोंग्रेस ने राजनीति में सदैव अपनी द्रष्टि को समाज से अलग केवल ब्रिटिश शासन की स्वामिभक्ति की ओर ही लगाए रक्खा।"
"१९०६ के आस-पास से ही कोंग्रेसमें मतभेद शुरू हो गए थे।कोंग्रेस नरम व गरम दलों में विभाजित हो गयी थी।"
नरम दल यानि अंग्रेजों की स्वामिभक्ति करने वाला दल था जिसके नेता थे गोखले व मोती लालनेहरू। दूसरा गरम दल जिसके नेता लोक मान्य तिलक थे। तिलक का नारा था ,"स्वराज मेराजन्म सिद्ध अधिकार है और मै उसे लेकर रहूँगा। " या कह सकते हैं कि कोंग्रेस का गरम दल वास्तव में एकराष्ट्रवादी कोंग्रेस का रूप था। यानि कि १९०६ से १९२० तक तिलक के नेर्तत्व में कोंग्रेस एक राष्ट्रवादी दल रहा। लेकिन १९१६ में गाँधी के अफ्रीका से आने के बाद स्थिति बदलनी शुरू हो गयी।सन १९२० में तिलक जी के स्वर्गवास के पश्चात अचानक परिस्थितियों ने अवसर दिया और गाँधी कोंग्रेस का बड़ा नेता बन गया।

गाँधी अगर चाहते तो वह तिलक के पूर्ण स्वराज्य की मांग को मजबूती प्रदान कर सकते थे।किन्तु गाँधी जी ने ऐसा नहीं किया। गाँधी जी ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अपना पहला आन्दोलन शुरू किया,जो इतिहास में असहयोग आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

वास्तव में असहयोग आन्दोलन, खिलाफत आन्दोलन(खिलाफत क्या बाला थी ,इसे आगे जानेंगे) का एक हिस्सा था। स्यवं गाँधी के शब्दों में ,"मुसलमानों के लिए स्वराज का अर्थ है,जो होना चाहिए। खिलाफत की समस्या के लिए.......खिलाफत के सहयोग के लिए आवश्यक पड़ने पर मै स्वराज्य प्राप्ति को भी सहर्ष स्थगित कर देने को तैयार हूँ।"

अब सबसे प्रथम यह जानना आवश्यक है कि खिलाफत आन्दोलन क्या बला थी?

भारतीय इतिहास में खिलाफत आन्दोलन का वर्णन तो है किन्तु कही विस्तार से नहीं बताया गयाकि खिलाफत आन्दोलन वस्तुत:भारत की स्वाधीनता के लिए नहीं अपितु वह एक राष्ट्र विरोधी व हिन्दू विरोधी आन्दोलन था।

खिलाफत आन्दोलन दूर देश तुर्की के खलीफा को गद्दी से हटाने के विरोध में भारतीय मुसलमानों द्वारा चलाया गया आन्दोलन था। असहयोग आन्दोलन भी खिलाफत आन्दोलन की सफलता के लिए चलाया गया आन्दोलन था। आज भी अधिकांश भारतीयों को यही पता है कि असहयोगआन्दोलन स्वतंत्रता प्राप्ति को चलाया गया कोंग्रेस का प्रथम आन्दोलन था। किन्तु सत्य तो यही है कि इस आन्दोलन का कोई भी रास्ट्रीय लक्ष्य नहीं था।

प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार के पश्चात अंग्रेजों ने वहां के खलीफा को गद्दी से पदच्युत कर दियाथा। खिलाफत+असहयोग आंदोलनों का लक्ष्य तुर्की के सुलतान की गद्दी वापस दिलाने के लिए चलाया गया आन्दोलन था।

यहाँ एक हास्यप्रद बात और है कि तुर्की की जनता ने स्वं ही कमाल अता तुर्क के नेर्तत्व्य में तुर्की के खलीफा को देश निकला दे दिया था।

भारत में मोहम्मद अली जोहर व शोकत अली जोहर दो भाई खिलाफत का नेर्तत्व कर रहे थे। गाँधी ने खिलाफत के सहयोग के लिए ही असहयोग आन्दोलन की घोषणा कर डाली। जब कुछ राष्ट्रवादी कोंग्रेसियों ने इसका विरोध किया तो गाँधी ने यहाँ तक कह डाला,"जो खिलाफत का विरोधी है तो वह कोंग्रेस का भी शत्रु है। "
इतिहास साक्षी है कि जिस समय खिलाफत आन्दोलन फेल हो गया ,तो मुसलमानों ने इसका सारा गुस्सा हिदू जनता पर निकला,मुसलमान जहाँ कहीं भी संख्या में अधिक थे ,हिन्दू समाज पर हमला करने लगे. हजारों हिदू ओरतों से बलात्कार हुए,लाखों की संख्या में तलवार के बल पर मुसलमान बना दिए गए. सबसे भयंकर स्थिति केरल में मालाबार में हुए जो इतिहास में मोपला कांड के नाम से जानी जाती है.

मोपला कांड में ही अकेले २० हजार हिन्दुओं को काट डाला गया ,२० हजार से ज्यादा को मुस्लमान बना डाला. १० हजार से अधिक हिदू ओरतों के बलात्कार हुए . और यह सब हुआ गाँधी के असहयोग आन्दोलन के कारण.

इस प्रकार कहा जा सकता है कि १९२० तक तिलक की जिस कोंग्रेस का लक्ष्य स्वराज्य प्राप्ति था गाँधी ने अचानक उसे बदलकर एक दूर देश तुर्की के खलीफा के सहयोग और मुस्लिम आन्दोलन में बदल डाला, जिसे वहांके जनता ने भी लात मरकर देश निकला दे दिया ।
दूर देश में मुस्लिम राज्य की स्थापना के लिए स्वराज्य की मांग को कोंग्रेस द्वारा ठुकराना इस आन्दोलन को चलाना किस प्रकार राष्ट्रवादी था या कितना राष्ट्रविरोधी भारतीय इतिहास में इससत्य का लिखा जाना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा भारतीय आजादी का दंभ भरने वाली कोंग्रेस लगातार भारत को इसे ही झूठ भरे इतिहास के साथ गहन अन्धकार की और रहेगी.