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बुधवार, 31 जुलाई 2013

ऊधम सिंह

ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 में पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम गाँव में हुआ। ऊधमसिंह की माता और पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। उनके जन्म के दो साल बाद 1901 में उनकी माँ का निधन हो गया और 1907 में उनके पिता भी चल बसे। ऊधमसिंह और उनके बड़े भाई मुक्तासिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। 1917 में उनके भाई का भी निधन हो गया। इस प्रकार दुनिया के ज़ुल्मों सितम सहने के लिए ऊधमसिंह बिल्कुल अकेले रह गए।

शहीद ऊधम सिंह का ऐतिहासिक बयान

जलिया वाले बाग के नरसंहार से भारतीय क्रांतिकारियों में बहुत आक्रोश उठा था और खून का बदला खून से लेने के लिए वह बेचैन हो गये थे। ऊधम सिंह ने इस नरसंहार का बदला लिया। 3 मार्च 1940 को लंदन के रायल सेन्ट्रल एशियन हाल में आयोजित अफगानिस्तान के संबंध में एक परिसवाद में भाग लेने के लिए यह दोनों लोग (ऊधण सिंह और सर माईकल औ डायर) उपस्थित थे। ऊधम सिंह श्रोता के रूप में जेब में पिस्तौल लेकर सभा में जा पहुंचे। वहां जैसे ही डायर भाषण समाप्त कर अपनी कुर्सी की ओर मुड़ा ऊधम सिंह एकदम खड़े हो गये और पिस्तौल निकालकर सर माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दी। डायर वहीं पर ढेर हो गया और सभा में सन्नाटा छा गया। ऊधम सिंह यह कार्य कर भागे नहीं उनको पकड़ लिया गया तथा 2 अप्रैल 1940 को अदालत में पेश किया गया।
उन्होंने न्यायाधीश के सामने बयान देते हुए कहा- मैंने यह हत्या इसलिए की है कि मुझे इस दरिंदे से नफरत थी। उसे जो सजा मिली है वह उसी के काबिल था। वह सच्चे अर्थों में एक अपराधी था। वह मेरे वतन के लोगों की आत्मा की हत्या करना चाहता था। इसलिए मैंने उसकी हत्या कर दी है। अगर आप सच माने तो मैं पूरे 20 वर्षों से बदला लेने के लिये यहां घूम रहा था। मुझे खुशी है कि मैंने अपनी काम पूरा कर लिया है। मैं मौत से नहीं डरता। मैं जवान मौत मरना चाहता हूं। बूढ़ा होकर या अपाहिज होकर मरने का क्या लाभ? मैं अपने देश की जनता के लिए अपने प्राण त्याग रहा हूं देश के लिए प्राण उत्सर्ग कर रहा हूं। क्या लार्ड जेटलैंड भी मर गये हैं। उनको जरूर मारना चाहिए। मैंने अपनी आंखों से देखा है कि अंग्रेजी हुकूमत से भारत की जनता दुखी है, भूख से मर रही है। मैं इसके विरोध में अपनी यह प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा हूं। यह मेरार् कत्तव्य है। इससे ज्यादा सम्मान मुझे क्या दिया जा सकता है कि अपनी प्यारी मातृभूमि के लिए मैं मृत्यु को वरण करूं। जब न्यायाधीश ने उनका नाम पूछा तो ऊधम सिंह ने जवाब दिय। मेरा नाम ऊधम सिंह नहीं है। मेरा नाम राम मुहम्मद सिंह आजाद हैं। उन्होंने राम शब्द का प्रयोग हिन्दुओं के लिए, मोहम्मद शब्द का प्रयोग मुसलमानों के लिए, सिंह का प्रयोग सिखों के लिए और आजाद शब्द का प्रयोग अपने देश की आजादी के लिए किया था। जब ऊधम सिंह लंदन जेल में थे उस समय जब कोई कैदी उन्हें नाम से बुलाता था तो उन पर इसकी तुरंत प्रतिक्रिया होती थी।
जेल से लिखे हुए अपने एक पत्र में उन्होंने कहा था, ‘मैं कैदी नहीं हूं, मैं तो इंग्लैंड की महारानी का सरकारी मेहमान हूं। ऊधम सिंह ने डायर को मारा, कबूल किया उनको फांसी की सजा सुनवाई गयी। अंत में उन्हें 31 जुलाई 1940 को फांसी दे दी गयी। एक क्रांतिकारी का अंत हो गया पर भारतीय आज भी उन्हें बड़ी इज्जत से याद करते हैं।
Photo: ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 में पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम गाँव में हुआ। ऊधमसिंह की माता और पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। उनके जन्म के दो साल बाद 1901 में उनकी माँ का निधन हो गया और 1907 में उनके पिता भी चल बसे। ऊधमसिंह और उनके बड़े भाई मुक्तासिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। 1917 में उनके भाई का भी निधन हो गया। इस प्रकार दुनिया के ज़ुल्मों सितम सहने के लिए ऊधमसिंह बिल्कुल अकेले रह गए।

शहीद ऊधम सिंह का ऐतिहासिक बयान

जलिया वाले बाग के नरसंहार से भारतीय क्रांतिकारियों में बहुत आक्रोश उठा था और खून का बदला खून से लेने के लिए वह बेचैन हो गये थे। ऊधम सिंह ने इस नरसंहार का बदला लिया। 3 मार्च 1940 को लंदन के रायल सेन्ट्रल एशियन हाल में आयोजित अफगानिस्तान के संबंध में एक परिसवाद में भाग लेने के लिए यह दोनों लोग (ऊधण सिंह और सर माईकल औ डायर) उपस्थित थे। ऊधम सिंह श्रोता के रूप में जेब में पिस्तौल लेकर सभा में जा पहुंचे। वहां जैसे ही डायर भाषण समाप्त कर अपनी कुर्सी की ओर मुड़ा ऊधम सिंह एकदम खड़े हो गये और पिस्तौल निकालकर सर माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दी। डायर वहीं पर ढेर हो गया और सभा में सन्नाटा छा गया। ऊधम सिंह यह कार्य कर भागे नहीं उनको पकड़ लिया गया तथा 2 अप्रैल 1940 को अदालत में पेश किया गया।
उन्होंने न्यायाधीश के सामने बयान देते हुए कहा- मैंने यह हत्या इसलिए की है कि मुझे इस दरिंदे से नफरत थी। उसे जो सजा मिली है वह उसी के काबिल था। वह सच्चे अर्थों में एक अपराधी था। वह मेरे वतन के लोगों की आत्मा की हत्या करना चाहता था। इसलिए मैंने उसकी हत्या कर दी है। अगर आप सच माने तो मैं पूरे 20 वर्षों से बदला लेने के लिये यहां घूम रहा था। मुझे खुशी है कि मैंने अपनी काम पूरा कर लिया है। मैं मौत से नहीं डरता। मैं जवान मौत मरना चाहता हूं। बूढ़ा होकर या अपाहिज होकर मरने का क्या लाभ? मैं अपने देश की जनता के लिए अपने प्राण त्याग रहा हूं देश के लिए प्राण उत्सर्ग कर रहा हूं। क्या लार्ड जेटलैंड भी मर गये हैं। उनको जरूर मारना चाहिए। मैंने अपनी आंखों से देखा है कि अंग्रेजी हुकूमत से भारत की जनता दुखी है, भूख से मर रही है। मैं इसके विरोध में अपनी यह प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा हूं। यह मेरार् कत्तव्य है। इससे ज्यादा सम्मान मुझे क्या दिया जा सकता है कि अपनी प्यारी मातृभूमि के लिए मैं मृत्यु को वरण करूं। जब न्यायाधीश ने उनका नाम पूछा तो ऊधम सिंह ने जवाब दिय। मेरा नाम ऊधम सिंह नहीं है। मेरा नाम राम मुहम्मद सिंह आजाद हैं। उन्होंने राम शब्द का प्रयोग हिन्दुओं के लिए, मोहम्मद शब्द का प्रयोग मुसलमानों के लिए, सिंह का प्रयोग सिखों के लिए और आजाद शब्द का प्रयोग अपने देश की आजादी के लिए किया था। जब ऊधम सिंह लंदन जेल में थे उस समय जब कोई कैदी उन्हें नाम से बुलाता था तो उन पर इसकी तुरंत प्रतिक्रिया होती थी।
जेल से लिखे हुए अपने एक पत्र में उन्होंने कहा था, ‘मैं कैदी नहीं हूं, मैं तो इंग्लैंड की महारानी का सरकारी मेहमान हूं। ऊधम सिंह ने डायर को मारा, कबूल किया उनको फांसी की सजा सुनवाई गयी। अंत में उन्हें 31 जुलाई 1940 को फांसी दे दी गयी। एक क्रांतिकारी का अंत हो गया पर भारतीय आज भी उन्हें बड़ी इज्जत से याद करते हैं।

शनिवार, 6 जुलाई 2013

हिन्दू नक्षत्र निरीक्षण केंद्र

क्या आप जानते हैं कि.... आजकल दिल्ली में हम जिसे कुतुबमीनार कहते हैं ...और .... उसे लूले कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाया गया समझते हैं.... दरअसल वह...... महाराजा विक्रमादित्य के राज्यकाल में.... राजा विक्रमादित्य द्वारा बनवाया गया .... ""हिन्दू नक्षत्र निरीक्षण केंद्र"" है..... जिसका ""असली नाम ध्रुव स्तम्भ"" है...!

परन्तु ... प्राचीन इतिहासकारों द्वारा मूर्खतावश.... और, आधुनिक काल में ""मुस्लिम तुष्टिकरण हेतु"" .... कुतुबमीनार को .... उस लूले कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाया गया.... कहा जाता है.....!

प्राचीन इतिहासकारों द्वारा .... बिना तथ्यों की जानकारी जुटाए ही .... कतिपय नामों की समानता के कारण ... ऐसा मान लिया गया कि..... कुतुबमीनार ... कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाया गया है...!

यह बहुत कुछ इसी प्रकार की मूर्खता है .... जैसे कि... कोई यह कहना शुरू कर दे कि..... आर्यभट्ट नामक उपग्रह .... आर्यभट्ट ने ही भेजा था.... अथवा .... सभी शहरों में मौजूद ... MG ROAD (महात्मा गाँधी रोड )... महात्मा गाँधी ने बनवाया था....!

जहाँ तक.... उस लूले गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक की बात है तो..... वो लुटेरा और जेहादी गोरी का गुलाम था.... और, वो गोरी के साथ ही भारत में जिहाद चलाने आया था..... जिसे बाद में भारत का प्रभारी बना कर ...स्थायी तौर पर भारत में जिहाद चलाने की अनुमति दे दी गयी थी..... जिस दौरान उसने .... भारत में सिर्फ लूट-पाट मचाई और.. मंदिरों को तोडा...!

हुआ दरअसल ये था कि.... जब वो लूला कुतुबुद्दीन .... जिहाद करते करते दिल्ली पहुंचा तो....... वहां इतना बड़ा और खुबसूरत स्तम्भ देखकर ..... उस लूले का मुंह खुला का खुला रह गया.... और, उसने अपने साथियों से पूछा कि .... ये क्या है...?????

इस पर.... उस लूले को अरबी में बताया गया ( क्योंकि, उस लूले को निपट मूर्ख होने के कारण हिंदी नहीं आती थी ) कि..... हुजुर ... ये ""क़ुतुब मीनार""" ... अर्थात , उत्तरी धुव का निरीक्षण केंद्र है ...!

बस यहीं से..... वो लूला और उसके उज्जड साथी इसे ... क़ुतुबमीनार- कुतुबमीनार कहने लगे .... !

उस पर भी ..... उस लूले कुतुबुद्दीन ऐबक ने ... ये बात खुद से कहीं भी नहीं कहा है कि..... कुतुबमीनार उसने बनवाया है..... लेकिन.... उसने ये जरुर कबूल किया है कि..... उसने इस स्तम्भ के चारों और बनी 27 मंदिरों को ध्वस्त कर दिया है !

लेकिन.... बाद के इतिहासकारों ने नामों में समानता देख कर .... बिना कुछ सोचे समझे ही ये नतीजा निकल लिया कि..... इस कुतुबमीनार को कुतुबुद्दीन ऐबक ने ही बनवाया होगा....!

अब अगर...... इतिहासकारों की बातों को छीलना शुरू किया जाए तो..... सबसे पहला प्रश्न यही है कि.....

अगर .... उस लूले कुतुबुद्दीन ने क़ुतुब मीनार बनाई..... तो कब ... क्योंकि.... कुतुबुद्दीन तो मात्र 4 साल ही भारत में जिहाद कर पाया था..... और...क्या कुतुबुद्दीन ने अपने निहायत ही छोटे राज्यकाल (1206 से 1210 ) में ... इतने बड़े मीनार का निर्माण करा सकता था .... जबकि पहले के दो वर्ष उसने लाहौर में विरोधियों को समाप्त करने में बिताये .....और, 1210 में भी मरने के पहले भी वह लाहौर में था ?????

फिर भी कुछ लोग अपनी थेथारोलोजी का इस्तेमाल करते हुए बोलते हैं कि.... लूले ने इसे 1193 AD में बनाना शुरू किया और कुतुबुद्दीन ने सिर्फ एक ही मंजिल बनायीं .. जबकि, उसके ऊपर के तीन मंजिलें उसके परवर्ती बादशाह इल्तुतमिश ने बनाई और ...... उसके ऊपर की शेष मंजिलें बाद में बनी....!

यदि उनकी ही बातों को माना जाए तो....अगर.... 1193 में कुतुबुद्दीन ने .....मीनार बनवाना शुरू किया होता तो ..... उसका नाम "बादशाह गोरी " के नाम पर.... "गोरी मीनार", या "गजनी मीनार " ऐसा ही कुछ होता ......... या कि ........ एक "लूले गुलाम कुतुबुद्दीन" के नाम पर .......क़ुतुब मीनार....????

अब कुछ लोगों ने ये भी कहना शुरू कर दिया है कि..... ऐबक ने नमाज़ समय अजान देने केलिए यह मीनार बनवाई थी...... तो क्या उतनी ऊंचाई से किसी की आवाज़ नीचे तक आ भी सकती है ?????
और फिर क्या.... बगल में ही मौजूद लौह स्तम्भ को ..... अजान के समय .... अल्लाह को बैठने के लिए बनाया गया था....??????

असल में.....सच तो यह है कि.... जिस स्थान में क़ुतुब परिसर है ....... उसे मेहरौली कहा जाता है,..... और यह मेहरौली ........वराहमिहिर के नाम पर बसाया गया था .....जो सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में एक और .. एक बहुत बड़े खगोलशास्त्री एवं भवन निर्माण विशेषज्ञ थे !

उन्होंने इस परिसर में मीनार यानि स्तम्भ के चारों ओर नक्षत्रों के अध्ययन के लिए........ 27 कलापूर्ण परिपथों का निर्माण करवाया था.... और, .इन परिपथों के स्तंभों पर सूक्ष्मकारीगरी के साथ देवी देवताओं की प्रतिमाएं भी उकेरी गयीं थीं जो नष्ट किये जाने के बाद भी कहीं कहीं दिख ही जाती हैं... ( चित्र संलग्न )

इसका दूसरा सबसे बड़ा प्रमाण..... उसी परिसर में खड़ा लौह स्तम्भ है........जिस पर खुदा हुआ ब्राम्ही भाषा का लेख.........जिसमे लिखा है कि..... यह स्तम्भ जिसे गरुड़ ध्वज कहा गया है... सम्राट चन्द्र गुप्त विक्रमादित्य (राज्य काल 380-414 ईसवीं ) द्वारा स्थापित किया गया था..... और, यह लौहस्तम्भ आज भी विज्ञान के लिए आश्चर्य की बात है ... क्योंकि... आज तक इसमें जंग नहीं लगा...
उसी महान सम्राट के दरबार में महान गणितज्ञ आर्य भट्ट.......खगोल शास्त्री एवं भवन निर्माण विशेषज्ञ वराह मिहिर......वैद्य राजब्रम्हगुप्त आदि हुए.......!

तो ये बहुत ही सामान्य ज्ञान कि बात है कि....ऐसे प्रतापी राजा के राज्य काल ....... जिसमे लौह स्तम्भ स्थापित हुआ ..........तो क्या जंगल में बिना कारण के सिर्फ अकेला स्तम्भ बना दिया गया होगा......??????

सोचो हिन्दुओं ...... आपके साथ क्या खेल खेला जा रहा है...... कि.... विध्वंसक को ही आपका निर्माता बना कर प्रस्तुत किया जा रहा है....!

क्या.... तुष्टिकरण का इस से भी ज्यादा घिनौना खेल ... दुनिया के किसी भाग में खेला जा सकता है....?????

जागो हिन्दुओं.... और, पहचानो अपने आपको ......

अन्यथा अभी तक तुम्हारा तो सिर्फ ऐतिहासिक धरोहर ही लूटा गया है..... .. कल तुम्हारे घर को लूटने की तैयारी है ....!

गुरुवार, 27 जून 2013

नालंदा विश्वविद्यालयन को क्यों जलाया गया था..? जानिए सच्चाई ...??

एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव वाला तुर्क लूटेरा था....बख्तियार खिलजी.
इसने ११९९ इसे जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया।
उसने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित
कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था.
एक बार वह बहुत बीमार पड़ा उसके हकीमों ने
उसको बचाने की पूरी कोशिश कर ली ...
मगर वह ठीक नहीं हो सका.
किसी ने उसको सलाह दी...
नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के
प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र
जी को बुलाया जाय और उनसे भारतीय
विधियों से इलाज कराया जाय
उसे यह सलाह पसंद नहीं थी कि कोई भारतीय
वैद्य ...
उसके हकीमों से उत्तम ज्ञान रखते हो और
वह किसी काफ़िर से .उसका इलाज करवाए
फिर भी उसे अपनी जान बचाने के लिए
उनको बुलाना पड़ा
उसने वैद्यराज के सामने शर्त रखी...
मैं तुम्हारी दी हुई कोई दवा नहीं खाऊंगा...
किसी भी तरह मुझे ठीक करों ...
वर्ना ...मरने के लिए तैयार रहो.
बेचारे वैद्यराज को नींद नहीं आई... बहुत
उपाय सोचा...
अगले दिन उस सनकी के पास कुरान लेकर
चले गए..
कहा...इस कुरान की पृष्ठ संख्या ... इतने से
इतने तक पढ़ लीजिये... ठीक हो जायेंगे...!
उसने पढ़ा और ठीक हो गया ..
जी गया...
उसको बड़ी झुंझलाहट
हुई...उसको ख़ुशी नहीं हुई
उसको बहुत गुस्सा आया कि ... उसके
मुसलमानी हकीमों से इन भारतीय
वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है...!
बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने
के बदले ...उनको पुरस्कार देना तो दूर ...
उसने नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग
लगवा दिया ...पुस्तकालयों को ही जला के
राख कर दिया...!
वहां इतनी पुस्तकें थीं कि ...आग
लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकें धू धू करके
जलती रहीं
उसने अनेक धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार
डाले.
आज भी बेशरम सरकारें...उस नालायक
बख्तियार खिलजी के नाम पर रेलवे स्टेशन
बनाये पड़ी हैं... !
उखाड़ फेंको इन अपमानजनक नामों को...
मैंने यह तो बताया ही नहीं... कुरान पढ़ के वह
कैसे ठीक हुआ था.
हम हिन्दू किसी भी धर्म ग्रन्थ को जमीन पर
रख के नहीं पढ़ते...
थूक लगा के उसके पृष्ठ नहीं पलटते
मिएँ ठीक उलटा करते हैं..... कुरान के हर पेज
को थूक लगा लगा के पलटते हैं...!
बस...
वैद्यराज राहुल श्रीभद्र जी ने कुरान के कुछ
पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप
लगा दिया था...
वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज चाट
गया...ठीक हो गया और उसने इस एहसान
का बदला नालंदा को नेस्तनाबूत करके दिया

शहीद उधम सिंह की कहानी जरूर पढ़ें !

मित्रो सन 1919 को एक करूर अंग्रेज़ अधिकारी भारत मे आया था जिसका नाम था डायर ! अमृतसर मे उसकी पोस्टिंग की गई थी और उसने एक रोलेट एक्ट नाम का कानून बनाया जिसमे नागरिकों के मूल अधिकार खत्म होने वाले थे ! और नागरिकों की जो थोड़ी बहुत बची कूची आजादी थी वो भी अंग्रेज़ो के पास जाने वाली थी !

इस रोलेट एक्ट का विरोध करने के लिए 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग मे एक बड़ी सभा आयोजित की गई थी ! जिसमे 25000 लोग शामिल हुए थे ! उस बड़ी सभा मे डायर ने अंधाधुंध गोलियां चलवायी थी ! अगर आप मे से किसी ने पुलिस या सेना मे नोकरी की हो तो आप अंदाजा लगा सकते हैं ! 15 मिनट के अंदर 1650 राउंड गोलियां चलवाई थी डायर ने ! और 3000 क्रांतिकारी वहीं तड़प तड़प के मर गए थे !

आप मे से किसी ने जलियाँवाला बाग देखा हो तो वहाँ अंदर जाने और बाहर आने के लिए एक ही दरवाजा है वो भी चार दीवारी से घिरा हुआ है और दरवाजा भी मुश्किल से 4 से 5 फुट चोड़ा है ! उस दरवाजे के बाहर डायर ने तोप लगवा दी थी ताकि कोई निकल के बाहर न जा पाये ! और अंदर उसके दो कुएं है जिसको अंधा कुंआ के नाम से जाना जाता है ! 1650 राउंड गोलियां जब चलायी गई ! जो लोग गोलियों के शिकार हुये वो तो वही शहीद हो गए और जो बच गए उन्होने ने जान बचाने के लिए कुएं मे छलांग लगा दी और कुंआ लाशों से भर गया !

और 15 मिनट तक गोलियां चलाते हुए डायर वहाँ से हँसते हुए चला गया और जाते हुये अमृतसर की सड्को पर जो उसे लोग मिले उन्हे गोलियां मार कर तोप के पीछे बांध कर घसीटता गया ! इसके लिए उसे अँग्रेजी संसद से ईनाम मिला था उसका प्रमोशन कर दिया गया था और उसको भारत से लंदन भेज दिया गया था और बड़े ओहदे पर !

उधम सिंह उस वक्त 11 साल के थे और ये ह्त्याकांड उन्होने अपनी आंखो से देखा था ! और उन्होने संकल्प लिया था संकल्प ये था जिस तरह डायर ने मेरे देश वासियो को इतनी क्रूरता से मारा हैं इस डायर को मैं जिंदा नहीं छोड़ूँगा ! यही मेरी ज़िंदगी का आखिरी संकल्प हैं ! आपको एक और बात मालूम होगी उधम सिंह की वह घर से गरीब थे माता पिता का साया उनसे उठ चुका था आनाथ आश्रम मे पल कर बड़े हुये थे ! बड़े भाई थे उनकी मौत हो चुकी थी किसी बीमारी से !

अब आर्थिक हालत अच्छे नहीं थे संकल्प ले लिया था डायर को मारने का ! उसके लिए योजना बनाई लंदन जाने की ! उसके लिए पैसे नहीं थे ! तो उन्होने सोचा मैं किसी आगे हाथ फैलाऊँ इससे अच्छा खुद मेहनत-मजदूरी करूँ ! फिर उन्होने carpenter (लकड़ी का काम किया) ! और कुछ पैसे कमा अमेरिका गए अमेरिका से फिर लंदन गए ! लंदन जाकर फिर किसी होटल मे नोकरी की पानी पिलाने की ताकि कुछ पैसे इकठे हो और उससे बंदूक खरीदी जा सके !

और ये सब काम करते करते शहीदे आजम उधम सिंह को 21 साल लग गए पूरे 21 साल ! 1919 मे जलियाँवाला बाग हत्याकांड हुआ था और 1940 मे पूरे 21 साल बाद उन्होने अपना संकल्प पूरा किया 21 साल तक वो मेहनत करते रहे,इधर उधर भागते रहे ,जिंदा रहे सिर्फ अपना संकल्प पूरा करने ले लिए !

अंत 1940 मे Caxton Hall एक जगह है लंदन मे वहाँ डायर को सम्मान दिया जा रहा था मालाएँ आदि पहनाई जा रही थी उधम सिंह वहाँ पहुंचे थे और अपने साथ लाई किताब मे छिपी बंदूक निकाल एक साथ 3 गोलियां डायर के सीने मे उतार दी ! 3 गोलियां मार कर एक ही वाकय कहा था कि आज मैंने 21 साल पहले लिया अपना संकल्प पूरा कर लिया है ! और मैं अब इसके बाद एक मिनट जिंदा नहीं रहना चाहता ! तो जब उन्होने बंदूक अंग्रेज़ अधिकारी को सोंपी तो अंग्रेज़ अधिकारी के हाथ कांप रहे थे ! उसको लग रहा था कहीं मुझे भी न मार दे ! तो उधम सिंह ने कहा घबराओ मत मेरे तुमसे कोई दुश्मनी नहीं है मेरी तो डायर से दुश्मनी थी जिसने मेरे देश के 3000 बेकसूर लोगो को तड़पा -तड़पा कर मारा था !

तो मित्रो हमारे क्रांतिकारियों का इतना ऊंचा आदर्श था जो संकल्प लिया है उसी की पूर्ति के लिए जीवन लगा देना है उसके लिए बेशक 10 साल लगे 15 साल लगे ! 20 लगे 21 साल लगे ! ये प्रेरणा हम सबको शहीदे आजम उधम सिंह के जीवन से लेनी चाहिए ! माँ भारती के इस पुत्र को दिल से सलाम !


वन्देमातरम !

मंगलवार, 25 जून 2013

प्राचीन भारतीय विज्ञानं के सन्दर्भ में सुरेशसोनी(suresh soni) जी का विद्युत् शास्त्र से सम्बंधित लेख



अगस्त्य संहिता का विद्युत्‌ शास्त्र
राव साहब कृष्णाजी वझे ने १८९१ में पूना से इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की। भारत में विज्ञान संबंधी ग्रंथों की खोज के दौरान उन्हें उज्जैन में दामोदर त्र्यम्बक जोशी के पास अगस्त्य संहिता के कुछ पन्ने मिले। यह शक संवत्‌ १५५० के करीब के थे। आगे चलकर इस संहिता के पन्नों में उल्लिखित वर्णन को पढ़कर नागपुर में संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे डा। एम.सी. सहस्रबुद्धे को आभास हुआ कि यह वर्णन डेनियल सेल से मिलता-जुलता है। अत: उन्होंने नागपुर में इंजीनियरिंग के प्राध्यापक श्री पी.पी. होले को वह दिया और उसे जांचने को कहा। अगस्त्य का सूत्र निम्न प्रकार था-
संस्थाप्य मृण्मये पात्रेताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌।
छादयेच्छिखिग्रीवेनचार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:।
संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥
अगस्त संहिताइसका तात्पर्य था, एक मिट्टी का पात्र (कठ्ठद्धद्यण्ड्ढद द्रदृद्य) लें, उसमें ताम्र पट्टिका (क्दृद्रद्रड्ढद्ध च्ण्ड्ढड्ढद्य) डालें तथा शिखिग्रीवा डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (ध्र्ड्ढद्य द्मठ्ठध्र्‌ क़्द्वद्मद्य) लगायें, ऊपर पारा (थ्र्ड्ढद्धड़द्वद्धन्र्‌) तथा दस्त लोष्ट (न्न्त्दड़) डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो, उससे मित्रावरुणशक्ति का उदय होगा।
उपर्युक्त वर्णन के आधार पर श्री होले तथा उनके मित्र ने तैयारी चालू की तो शेष सामग्री तो ध्यान में आ गई, परन्तु शिखिग्रीवा समझ में नहीं आया। संस्कृत कोष में देखने पर ध्यान में आया कि शिखिग्रीवा याने मोर की गर्दन। अत: वे और उनके मित्र बाग गए तथा वहां के प्रमुख से पूछा, क्या आप बता सकते हैं, आपके झ्दृदृ में मोर कब मरेगा, तो उसने नाराज होकर कहा क्यों? तब उन्होंने कहा, एक प्रयोग के लिए उसकी गरदन की आवश्यकता है। यह सुनकर उसने कहा ठीक है। आप एक एप्लीकेशन दे जाइये। इसके कुछ दिन बाद एक आयुर्वेदाचार्य से बात हो रही थी। उनको यह सारा घटनाक्रम सुनाया तो वे हंसने लगे और उन्होंने कहा, यहां शिखिग्रीवा का अर्थ मोर की गरदन नहीं अपितु उसकी गरदन के रंग जैसा पदार्थ कॉपरसल्फेट है। यह जानकारी मिलते ही समस्या हल हो गई और फिर इस आधार पर एक सेल बनाया और डिजीटल मल्टीमीटर द्वारा उसको नापा।
उसका ग्र्द्रड्ढद क्त्द्धड़द्वत्द्य ध्दृथ्द्यठ्ठढ़ड्ढ था १।३८ ज्दृथ्द्यद्म और च्ण्दृद्धद्य क्त्द्धड़द्वत्द्य क्द्वद्धद्धड्ढदद्य था २३ ग्त्थ्थ्त्‌ ठ्ठथ्र्द्रड्ढद्धड्ढद्म।प्रयोग सफल होने की सूचना डा. एम.सी. सहस्रबुद्धे को दी गई। इस सेल का प्रदर्शन ७ अगस्त, १९९० को स्वदेशी विज्ञान संशोधन संस्था (नागपुर) के चौथे वार्षिक सर्वसाधारण सभा में अन्य विद्वानों के सामने हुआ। तब विचार आया कि यह वर्णन इलेक्ट्रिक सेल का है। पर इसका आगे का संदर्भ क्या है इसकी खोज हुई और आगे ध्यान में आया ऋषि अगस्त ने इसके आगे की भी बातें लिखी हैं-
अनने जलभंगोस्ति प्राणोदानेषु वायुषु।
एवं शतानां कुंभानांसंयोगकार्यकृत्स्मृत:॥
अगस्त संहिताअगस्त्य कहते हैं सौ कुंभों की शक्ति का पानी पर प्रयोग करेंगे, तो पानी अपने रूप को बदल कर प्राण वायु ( ग्र्न्न्र्ढ़ड्ढद) तथा उदान वायु (क्तन्र्ड्डद्धदृढ़ड्ढद) में परिवर्तित हो जाएगा। उदान वायु को वायु प्रतिबन्धक वस्त्र में रोका जाए तो यह विमान विद्या में काम आता है।वायुबन्धकवस्त्रेणनिबद्धो यानमस्तकेउदान : स्वलघुत्वे बिभर्त्याकाशयानकम्‌। (अगस्त्य संहिता शिल्प शास्त्र सार)राव साहब वझे, जिन्होंने भारतीय वैज्ञानिक ग्रंथ और प्रयोगों को ढूंढ़ने में अपना जीवन लगाया, उन्होंने अगस्त्य संहिता एवं अन्य ग्रंथों के आधार पर विद्युत भिन्न-भिन्न प्रकार से उत्पन्न होती हैं, इस आधार उसके भिन्न-भिन्न नाम रखे-(१) तड़ित्‌-रेशमी वस्त्रों के घर्षण से उत्पन्न।(२) सौदामिनी-रत्नों के घर्षण से उत्पन्न।(३) विद्युत-बादलों के द्वारा उत्पन्न।(४) शतकुंभी-सौ सेलों या कुंभों से उत्पन्न।(५) हृदनि- हृद या स्टोर की हुई बिजली।(६) अशनि-चुम्बकीय दण्ड से उत्पन।अगस्त्य संहिता में विद्युत्‌ का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग के लिए करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबा या सोना या चांदी पर पालिश चढ़ाने की विधि निकाली। अत: अगस्त्य को कुंभोद्भव (एठ्ठद्यद्यड्ढद्धन्र्‌ एदृदड्ढ) कहते हैं।
कृत्रिमस्वर्णरजतलेप: सत्कृतिरुच्यते।
-शुक्र नीतियवक्षारमयोधानौ सुशक्तजलसन्निधो॥
आच्छादयति तत्ताम्रंस्वर्णेन रजतेन वा।
सुवर्णलिप्तं तत्ताम्रंशातकुंभमिति स्मृतम्‌॥
५ (अगस्त्य संहिता)अर्थात्‌-कृत्रिम स्वर्ण अथवा रजत के लेप को सत्कृति कहा जाता है। लोहे के पात्र में सुशक्त जल अर्थात तेजाब का घोल इसका सानिध्य पाते ही यवक्षार (सोने या चांदी का नाइट्रेट) ताम्र को स्वर्ण या रजत से ढंक लेता है। स्वर्ण से लिप्त उस ताम्र को शातकुंभ अथवा स्वर्ण कहा जाता है

मोतीलाल (वेश्यालय मालिक) व नेहरू(nehru) का जन्म वेश्यालय में हुआ था.


मोतीलाल (वेश्यालय मालिक) व नेहरू का जन्म वेश्यालय में हुआ था.
मोतीलाल ( भारत के प्रथम प्रधान मंत्री का पिता ) अधिक पढ़ा लिखा व्यक्ति नहीं था. कम उम्र में विवाह के बाद जीविका की खोज में वह इलाहबाद आ गया था. हमें यह पता नहीं की निश्चित रूप से वह इलाहबाद में कहाँ आकर बसा होगा ,किन्तु हम विश्वास नहीं कर सकते की उसके बसने का स्थान मीरगंज रहा होगा ,जहाँ तुर्क व मुग़ल अपहृत हिन्दू महिलाओं को अपने मनोरंजन के लिए रखते थे. हम एसा इस लिए कह रहे हैं की अब हम अच्छी तरह जान चुके हैं की मोतीलाल अपनी दूसरी पत्नी के साथ मीरगंज में वेश्याओं के इलाके में रहा था. पहली पत्नी एक पुत्र के होने के बाद मर गयी थी. कुछ दिन पश्चात उसका पुत्र भी मर गया .जिसके बाद वह कश्मीर लोट गया. जहाँ पर एक बार फिर तीसरा विवाह किया. और तीसरी पत्नी के साथ फिर से इलाहबाद लोट आया. उसने जीविका चलने के लिए वेश्यालय चलने का निश्चय किया. दिन के समय मोतीलाल कचहरी में मुख्तार का काम करता था.उसी उच्च न्यायलय में एक प्रसिद्द वकील मुबारक अली था जिसकी वकालत बहुत चलती थी. इशरत मंजिल के नाम से उसका एक मकान था.
कचहरी से मोतीलाल पैदल ही अपने घर लोटता था. मुबारक अली भी शाम को रंगीन बनाने के लिए मीरगंज आता रहता था. एक दिन मीरगंज में ही मोतीलाल मुबारक अली से मिला और अपनी नई पत्नी के साथ रात बिताने का निमंत्रण दिया. सोदा पट गया.और इस प्रकार मोतीलाल के सम्बन्ध मुबारक अली से बन गए. दोनों ने इटावा की विधवा रानी को उसका राज्य वापस दिलाने के लिए जमकर लूटा. उस समय लगभग १० लाख की फीस ली. और आधी आधी बाँट ली. यही से मोतीलाल की किस्मत का सितारा बदल गया.
इसी बीच मोतीलाल की बीबी गर्भवती हो गयी. मुबारक ने माना की बच्चा उसी की नाजायज ओलाद है.मोतीलाल ने मुबारक से भावी संतान के लिए इशरत महल में स्थान माँगा. किन्तु मुबारक ने मना कर दिया. किन्तु जच्चा-बच्चा का सारा खर्च वहन किया. अंत में भारत का भावी प्रधान मंत्री मीरगंज के वेश्यालय में पैदा हुआ. जैसे ही जवाहर पी एम् बना वैसे ही तुरंत उसने मीरगंज का वह मकान तुडवा दिया ,और अफवाह फैला दी की वह आनद भवन (इशरत महल)में पैदा हुआ था जबकि उस समय आनंद भवन था ही नहीं.
मुबारक का सम्बन्ध बड़े प्रभुत्वशाली मुसलमानों से था. अवध के नवाब को जब पता चला की मुबारक का एक पुत्र मीरगंज के वेश्यालय में पल रहा है तो उसने मुबारक से उसे इशरत महल लाने को कहा. और इस प्रकार नेहरू की परवरिश इशरत महल में हुई. और इसी बात को नेहरू गर्व से कहता था की उसकी शिक्षा विदेशों में हुई,इश्लाम के तोर तरीके से उसका विकास हुआ.और हिन्दू तो वह मात्र दुर्घटनावश ही था.
(पुस्तक -नेहरु खान वंश ,प्रकाशक-मानव रक्षा संघ )इसे नेट पर पढने के लिएwww.aryavrt.com साईट देखें.

राष्ट्र विरोधी व् हिन्दू विरोधी था गाँधी का असहयोग आन्दोलन



मह्रिषी अरविन्द ने १९०९ में कहा था "प्रारंभ से ही कोंग्रेस ने राजनीति में सदैव अपनी द्रष्टि को समाज से अलग केवल ब्रिटिश शासन की स्वामिभक्ति की ओर ही लगाए रक्खा।"
"१९०६ के आस-पास से ही कोंग्रेसमें मतभेद शुरू हो गए थे।कोंग्रेस नरम व गरम दलों में विभाजित हो गयी थी।"
नरम दल यानि अंग्रेजों की स्वामिभक्ति करने वाला दल था जिसके नेता थे गोखले व मोती लालनेहरू। दूसरा गरम दल जिसके नेता लोक मान्य तिलक थे। तिलक का नारा था ,"स्वराज मेराजन्म सिद्ध अधिकार है और मै उसे लेकर रहूँगा। " या कह सकते हैं कि कोंग्रेस का गरम दल वास्तव में एकराष्ट्रवादी कोंग्रेस का रूप था। यानि कि १९०६ से १९२० तक तिलक के नेर्तत्व में कोंग्रेस एक राष्ट्रवादी दल रहा। लेकिन १९१६ में गाँधी के अफ्रीका से आने के बाद स्थिति बदलनी शुरू हो गयी।सन १९२० में तिलक जी के स्वर्गवास के पश्चात अचानक परिस्थितियों ने अवसर दिया और गाँधी कोंग्रेस का बड़ा नेता बन गया।

गाँधी अगर चाहते तो वह तिलक के पूर्ण स्वराज्य की मांग को मजबूती प्रदान कर सकते थे।किन्तु गाँधी जी ने ऐसा नहीं किया। गाँधी जी ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अपना पहला आन्दोलन शुरू किया,जो इतिहास में असहयोग आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

वास्तव में असहयोग आन्दोलन, खिलाफत आन्दोलन(खिलाफत क्या बाला थी ,इसे आगे जानेंगे) का एक हिस्सा था। स्यवं गाँधी के शब्दों में ,"मुसलमानों के लिए स्वराज का अर्थ है,जो होना चाहिए। खिलाफत की समस्या के लिए.......खिलाफत के सहयोग के लिए आवश्यक पड़ने पर मै स्वराज्य प्राप्ति को भी सहर्ष स्थगित कर देने को तैयार हूँ।"

अब सबसे प्रथम यह जानना आवश्यक है कि खिलाफत आन्दोलन क्या बला थी?

भारतीय इतिहास में खिलाफत आन्दोलन का वर्णन तो है किन्तु कही विस्तार से नहीं बताया गयाकि खिलाफत आन्दोलन वस्तुत:भारत की स्वाधीनता के लिए नहीं अपितु वह एक राष्ट्र विरोधी व हिन्दू विरोधी आन्दोलन था।

खिलाफत आन्दोलन दूर देश तुर्की के खलीफा को गद्दी से हटाने के विरोध में भारतीय मुसलमानों द्वारा चलाया गया आन्दोलन था। असहयोग आन्दोलन भी खिलाफत आन्दोलन की सफलता के लिए चलाया गया आन्दोलन था। आज भी अधिकांश भारतीयों को यही पता है कि असहयोगआन्दोलन स्वतंत्रता प्राप्ति को चलाया गया कोंग्रेस का प्रथम आन्दोलन था। किन्तु सत्य तो यही है कि इस आन्दोलन का कोई भी रास्ट्रीय लक्ष्य नहीं था।

प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार के पश्चात अंग्रेजों ने वहां के खलीफा को गद्दी से पदच्युत कर दियाथा। खिलाफत+असहयोग आंदोलनों का लक्ष्य तुर्की के सुलतान की गद्दी वापस दिलाने के लिए चलाया गया आन्दोलन था।

यहाँ एक हास्यप्रद बात और है कि तुर्की की जनता ने स्वं ही कमाल अता तुर्क के नेर्तत्व्य में तुर्की के खलीफा को देश निकला दे दिया था।

भारत में मोहम्मद अली जोहर व शोकत अली जोहर दो भाई खिलाफत का नेर्तत्व कर रहे थे। गाँधी ने खिलाफत के सहयोग के लिए ही असहयोग आन्दोलन की घोषणा कर डाली। जब कुछ राष्ट्रवादी कोंग्रेसियों ने इसका विरोध किया तो गाँधी ने यहाँ तक कह डाला,"जो खिलाफत का विरोधी है तो वह कोंग्रेस का भी शत्रु है। "
इतिहास साक्षी है कि जिस समय खिलाफत आन्दोलन फेल हो गया ,तो मुसलमानों ने इसका सारा गुस्सा हिदू जनता पर निकला,मुसलमान जहाँ कहीं भी संख्या में अधिक थे ,हिन्दू समाज पर हमला करने लगे. हजारों हिदू ओरतों से बलात्कार हुए,लाखों की संख्या में तलवार के बल पर मुसलमान बना दिए गए. सबसे भयंकर स्थिति केरल में मालाबार में हुए जो इतिहास में मोपला कांड के नाम से जानी जाती है.

मोपला कांड में ही अकेले २० हजार हिन्दुओं को काट डाला गया ,२० हजार से ज्यादा को मुस्लमान बना डाला. १० हजार से अधिक हिदू ओरतों के बलात्कार हुए . और यह सब हुआ गाँधी के असहयोग आन्दोलन के कारण.

इस प्रकार कहा जा सकता है कि १९२० तक तिलक की जिस कोंग्रेस का लक्ष्य स्वराज्य प्राप्ति था गाँधी ने अचानक उसे बदलकर एक दूर देश तुर्की के खलीफा के सहयोग और मुस्लिम आन्दोलन में बदल डाला, जिसे वहांके जनता ने भी लात मरकर देश निकला दे दिया ।
दूर देश में मुस्लिम राज्य की स्थापना के लिए स्वराज्य की मांग को कोंग्रेस द्वारा ठुकराना इस आन्दोलन को चलाना किस प्रकार राष्ट्रवादी था या कितना राष्ट्रविरोधी भारतीय इतिहास में इससत्य का लिखा जाना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा भारतीय आजादी का दंभ भरने वाली कोंग्रेस लगातार भारत को इसे ही झूठ भरे इतिहास के साथ गहन अन्धकार की और रहेगी.

गणित विद्या और शून्य का आविष्कार



सभी यह जानते हैं कि गणित में शून्य और दशमलव का आविष्कार भारत ने किया है किन्तु यह आंशिक सत्य है क्योंकि गणित विद्या का मूल(कारण) वेदों में है जिसमें न केवल शून्य से लेकर ९ तक सभी प्राकृतिक अंको का वर्णन है वरन अंक गणित, बीज गणित और रेखा गणित सभी गणित विद्या के ३ आधार ईश्वर ने हमको दिये हैं। बहुत से लोग यह मानते हैं आर्य भट्ट ने शून्य का या दशमलव का आविष्कार किया था जोकि गलत है क्योंकि यह तो पहले से ही वेदों में है, आर्य भट्ट निश्चित तौर पर एक महान गणितज्ञ थे इसमें कोई सन्देह नहीं है किन्तु प्राकृतिक संख्याओं के निर्माण का विज्ञान मानव ज्ञान से बहार की बात है। मैं यहाँ वेदों के मन्त्र तो नहीं लिख रहा हूँ किन्तु उनमें से उधृत कुछ एक बातों को लिख रहा हूँ प्रमाण के तौर पर।

अंक, बीज और रेखा भेद से जो तीन प्रकार की गणित विद्या सिद्ध की जाती है , उनमें से प्रथम अंक(१) जो संख्या है, सो दो बार गणने से २ की वाचक होती है। जैसे १+१=२। ऐसे ही एक के आगे एक तथा एक के आगे दो, वा दो के आगे १ आदि जोड़ने से ९ तक अंक होते हैं। इसी प्रकार एक के साथ तीन(३) जोड़ने से चार (४) तथा तीन(३) को तीन(३) के साथ जोड़ने से ६ अथवा तीन को तीन गुणने से ३ x ३ = ९ होते हैं।

इसी प्रकार चार के साथ चार , पाञ्च के साथ पाञ्च, छः के साथ छः, आठ के साथ आठ इत्यादि जोड़ने वा गुणने तथा सब मन्त्रों के आशय को को फ़ैलाने सब गणितविद्या निकलती है। जैसे पाञ्च के साथ पाञ्च (५५) वैसे ही छः छः इत्यादि जान लेने चाहियें। ऐसे ही इन मन्त्रों के अर्थो का आगे योजना करने से अंकों से अनेक प्रकार की गणित विद्या सिद्ध होती है। क्योंकि इन मन्त्रों के अर्थ और अनेक प्रकार के प्रयोगों से मनुष्यों को अनेक प्रकार की गणित विद्या अवश्य जाननी चाहिये ।
और जो कि वेदों का अंक ज्योतिषशास्त्र कहाता है (आज का कथित फलित ज्योतिषशास्त्र नहीं), उसमें भी इसी प्रकार के मन्त्रों के अभिप्राय से गणितविद्या सिद्ध की है और अंकों से जो गणित विद्या निकलती है , वह निश्चित और संख्यात पदार्थों में युक्त होती है। और अज्ञात पदार्थों की संख्या जानने के लिये बीजगणित होता है , सो भी अनेक मन्त्रों से सिद्ध होता है। जैसे (अ + क) (अ-क) (अ ÷ क) (अ x क) इत्यादि संकेत से निकलता है । यह भी वेदों से ही ऋषि-मुनियों ने निकला है। (अग्न आ०) इस मन्त्र के संकेतों से भी बीज गणित निकलता है।

और इसी प्रकार से तीसरा भाग जो रेखागणित है सो भी वेदों से ही सिद्ध होता है। अनेक मन्त्रों से रेखागणित का प्रकाश किया है। यज्ञ-वेदी के रचने में भी रेखा गणित का भी उपदेश है। पृथ्वी का जो चारो ओर घेरा है, उसको परिधि और ऊपर से अन्त तक जो पृथ्वी की रेखा है उसको व्यास कहते हैं। इसी प्रकार से इन मन्त्रों में आदि मध्य और अन्त आदि रेखाओं को भी जानना चाहिये और इस रीति से त्रियक् विषुवत रेखा आदि भी निकलती हैं

(कासीत्प्र०) अर्थात यथार्थ ज्ञान क्या है ? (प्रतिमा) जिससे पदार्थों का तोल किया जाये सो क्या चीज़ है ? (निदानम्) अर्थात कारण जिससे कार्य उत्पन्न होता है , वह क्या चीज़ है (आज्यं) जगत में जानने के योग्य सारभूत क्या है ? (परिधिः०) परिधि किसको कहते हैं ? (छन्दः०) स्वतन्त्र वस्तु क्या है ? (प्रउ०) प्रयोग और शब्दों से स्तुति करने के योग्य क्या है ? इन सात प्रश्नों का उत्तर यथावत दिया जाता है (यद्देवा देव०) जिसको सब विद्वान लोग पूजते हैं वही परमेश्वर प्रमा आदि नाम वाला है।
इन मन्त्रों में भी प्रमा और परिधि आदि शब्दों से रेखागणित साधने का उपदेश परमात्मा ने किया है। सो यह ३ प्रकार की गणित विद्या के अनेक मन्त्रों से आर्यों ने वेदों से ही सिद्ध की है और इसी आर्य्यावर्त्त देश से सर्वत्र भूगोल में गयी है।

गणित के साथ-२ समस्त विश्व के ज्ञान का आधार वेद ही हैं इसमें सन्देह नहीं करनी चाहिये। वेदों के नाम पर बकवासबाजी लिखने वालों पर न जाकर सत्य से अवगत होना चाहिये उदाहरण के तौर पर आज कल ज्योतिषशास्त्र के नाम पर जो धन्धा चल रहा है उसका वैदिक पुस्तकों में कहीं वर्णन नहीं है वो स्वार्थी और मुर्ख लोगो ने खड़ा किया है जिसको अनजाने में बहुत लोग मानते हैं जबकि सत्य यह है कि मनुष्य अपने कर्मो के आधार पर ही अपने भविष्य का निर्माण करता है न कि काला कपड़ा, दाल, तेल आदि अन्धविश्वास भरे दान देने से। वेदों से आधार लेकर ही महान ऋषियों ने अनेक प्रकार की विद्या सिद्ध की है।

आज राष्ट्र की स्तिथि अच्छी नहीं है, हमें हमारी जड़ों से हमें काटा जा रहा है, हमारे स्वाभिमान पर निरन्तर आघात किये जा रहे हैं इसीलिए हमें अपने धर्म के मूल से परिचित अवश्य होना चाहिये जिसको जानने से हमें ज्ञान और स्वाभिमान आएगा और हम राष्ट्र-सेवा के लिये उठ खड़े होंगे। हमारा मूल धर्म ज्ञान-विज्ञान के साथ-२ राष्ट्र-सेवा की प्रबल प्रेरणा देता है उसका विरोधी नहीं है इसीलिए भी समस्त राष्ट्र-विरोधी शक्तियां हमारे धर्म को निशाने पर रखती हैं।

कितने ही विश्व के लोग और मत कुछ पुस्तकों को ईश्वरीय पुस्तक मानते हैं जबकि उनमें अनेक साक्षात् प्रमाण हैं अवैज्ञानिकता के, मूर्खता के, धूर्तता के और भी अतार्किक बाते हैं किन्तु फिर भी उन मतों के लोग उन पुस्तकों के प्रचार में दिन-रात एक किये हुए हैं, बड़े-२ संगठन बनाये हुए हैं, युद्ध लड़ रहे हैं, पैसा बहा रहे हैं कि हमारी पुस्तक को ईश्वरीय मानो उसका अनुसरण करो वरना तुम्हारी खैर नहीं. और दूसरी तरफ सनातन हिन्दू वैदिक धर्म समस्त मानव जाति के कल्याण के लिये है उसमें किसी भी प्रकार का भेद-भाव नहीं है किसी प्रकार का दोष नहीं है किसी प्रकार की भी अवैज्ञानिकता नहीं है कोई अतार्किकता नहीं है जो सृष्टि के कण-२ से लेकर अखिल ब्रह्माण्ड का ज्ञान देता है, समस्त विद्याएं जिससे निकली हैं और उसका कोई प्रवर्तक कम से कम कोई मनुष्य भी नहीं है यह तो हम सभी जानते ही हैं इस सबके बावजूद भी इसको ईश्वरीय मानने में हम लोग ही सन्देह करते हैं कैसा विरोधाभास है।

सोमवार, 24 जून 2013

सत्ता के हस्तांतरण की संधि ( Transfer of Power Agreement )

writer --anand g sharma

आपने देखा होगा कि राजीव भाई बराबर सत्ता के हस्तांतरण के संधि के बारे में बाट करते थे और आप बार बार सोचते होंगे कि आखिर ये क्या है ? मैंने उनके अलग अलग व्याख्यानों में से इन सब को जोड़ के आप लोगों के लिए लाया हूँ उम्मीद है कि आपको पसंद आएगी | पढ़िए सत्ता के हस्तांतरण की संधि ( Transfer of Power Agreement ) यानि भारत के आज़ादी की संधि | ये इतनी खतरनाक संधि है की अगर आप अंग्रेजों द्वारा सन 1615 से लेकर 1857 तक किये गए सभी 565 संधियों या कहें साजिस को जोड़ देंगे तो उस से भी ज्यादा खतरनाक संधि है ये | 14 अगस्त 1947 की रात को जो कुछ हुआ है वो आजादी नहीं आई बल्कि ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट हुआ था पंडित नेहरु और लोर्ड माउन्ट बेटन के बीच में | Transfer of Power और Independence ये दो अलग चीजे है | स्वतंत्रता और सत्ता का हस्तांतरण ये दो अलग चीजे है | और सत्ता का हस्तांतरण कैसे होता है ? आप देखते होंगे क़ि एक पार्टी की सरकार है, वो चुनाव में हार जाये, दूसरी पार्टी की सरकार आती है तो दूसरी पार्टी का प्रधानमन्त्री जब शपथ ग्रहण करता है, तो वो शपथ ग्रहण करने के तुरंत बाद एक रजिस्टर पर हस्ताक्षर करता है, आप लोगों में से बहुतों ने देखा होगा, तो जिस रजिस्टर पर आने वाला प्रधानमन्त्री हस्ताक्षर करता है, उसी रजिस्टर को ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर की बुक कहते है और उस पर हस्ताक्षर के बाद पुराना प्रधानमन्त्री नए प्रधानमन्त्री को सत्ता सौंप देता है | और पुराना प्रधानमंत्री निकल कर बाहर चला जाता है | यही नाटक हुआ था 14 अगस्त 1947 की रात को 12 बजे | लार्ड माउन्ट बेटन ने अपनी सत्ता पंडित नेहरु के हाथ में सौंपी थी, और हमने कह दिया कि स्वराज्य आ गया | कैसा स्वराज्य और काहे का स्वराज्य ? अंग्रेजो के लिए स्वराज्य का मतलब क्या था ? और हमारे लिए स्वराज्य का मतलब क्या था ? ये भी समझ लीजिये | अंग्रेज कहते थे क़ि हमने स्वराज्य दिया, माने अंग्रेजों ने अपना राज तुमको सौंपा है ताकि तुम लोग कुछ दिन इसे चला लो जब जरुरत पड़ेगी तो हम दुबारा आ जायेंगे | ये अंग्रेजो का interpretation (व्याख्या) था | और हिन्दुस्तानी लोगों की व्याख्या क्या थी कि हमने स्वराज्य ले लिया | और इस संधि के अनुसार ही भारत के दो टुकड़े किये गए और भारत और पाकिस्तान नामक दो Dominion States बनाये गए हैं | ये Dominion State का अर्थ हिंदी में होता है एक बड़े राज्य के अधीन एक छोटा राज्य, ये शाब्दिक अर्थ है और भारत के सन्दर्भ में इसका असल अर्थ भी यही है | अंग्रेजी में इसका एक अर्थ है "One of the self-governing nations in the British Commonwealth" और दूसरा "Dominance or power through legal authority "| Dominion State और Independent Nation में जमीन आसमान का अंतर होता है | मतलब सीधा है क़ि हम (भारत और पाकिस्तान) आज भी अंग्रेजों के अधीन/मातहत ही हैं | दुःख तो ये होता है की उस समय के सत्ता के लालची लोगों ने बिना सोचे समझे या आप कह सकते हैं क़ि पुरे होशो हवास में इस संधि को मान लिया या कहें जानबूझ कर ये सब स्वीकार कर लिया | और ये जो तथाकथित आज़ादी आयी, इसका कानून अंग्रेजों के संसद में बनाया गया और इसका नाम रखा गया Indian Independence Act यानि भारत के स्वतंत्रता का कानून | और ऐसे धोखाधड़ी से अगर इस देश की आजादी आई हो तो वो आजादी, आजादी है कहाँ ? और इसीलिए गाँधी जी (महात्मा गाँधी) 14 अगस्त 1947 की रात को दिल्ली में नहीं आये थे | वो नोआखाली में थे | और कोंग्रेस के बड़े नेता गाँधी जी को बुलाने के लिए गए थे कि बापू चलिए आप | गाँधी जी ने मना कर दिया था | क्यों ? गाँधी जी कहते थे कि मै मानता नहीं कि कोई आजादी आ रही है | और गाँधी जी ने स्पस्ट कह दिया था कि ये आजादी नहीं आ रही है सत्ता के हस्तांतरण का समझौता हो रहा है | और गाँधी जी ने नोआखाली से प्रेस विज्ञप्ति जारी की थी | उस प्रेस स्टेटमेंट के पहले ही वाक्य में गाँधी जी ने ये कहा कि मै हिन्दुस्तान के उन करोडो लोगों को ये सन्देश देना चाहता हु कि ये जो तथाकथित आजादी (So Called Freedom) आ रही है ये मै नहीं लाया | ये सत्ता के लालची लोग सत्ता के हस्तांतरण के चक्कर में फंस कर लाये है | मै मानता नहीं कि इस देश में कोई आजादी आई है | और 14 अगस्त 1947 की रात को गाँधी जी दिल्ली में नहीं थे नोआखाली में थे | माने भारत की राजनीति का सबसे बड़ा पुरोधा जिसने हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई की नीव रखी हो वो आदमी 14 अगस्त 1947 की रात को दिल्ली में मौजूद नहीं था | क्यों ? इसका अर्थ है कि गाँधी जी इससे सहमत नहीं थे | (नोआखाली के दंगे तो एक बहाना था असल बात तो ये सत्ता का हस्तांतरण ही था) और 14 अगस्त 1947 की रात को जो कुछ हुआ है वो आजादी नहीं आई .... ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट लागू हुआ था पंडित नेहरु और अंग्रेजी सरकार के बीच में | अब शर्तों की बात करता हूँ , सब का जिक्र करना तो संभव नहीं है लेकिन कुछ महत्वपूर्ण शर्तों की जिक्र जरूर करूंगा जिसे एक आम भारतीय जानता है और उनसे परिचित है ...............

इस संधि की शर्तों के मुताबिक हम आज भी अंग्रेजों के अधीन/मातहत ही हैं | वो एक शब्द आप सब सुनते हैं न Commonwealth Nations | अभी कुछ दिन पहले दिल्ली में Commonwealth Game हुए थे आप सब को याद होगा ही और उसी में बहुत बड़ा घोटाला भी हुआ है | ये Commonwealth का मतलब होता है समान सम्पति | किसकी समान सम्पति ? ब्रिटेन की रानी की समान सम्पति | आप जानते हैं ब्रिटेन की महारानी हमारे भारत की भी महारानी है और वो आज भी भारत की नागरिक है और हमारे जैसे 71 देशों की महारानी है वो | Commonwealth में 71 देश है और इन सभी 71 देशों में जाने के लिए ब्रिटेन की महारानी को वीजा की जरूरत नहीं होती है क्योंकि वो अपने ही देश में जा रही है लेकिन भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को ब्रिटेन में जाने के लिए वीजा की जरूरत होती है क्योंकि वो दुसरे देश में जा रहे हैं | मतलब इसका निकाले तो ये हुआ कि या तो ब्रिटेन की महारानी भारत की नागरिक है या फिर भारत आज भी ब्रिटेन का उपनिवेश है इसलिए ब्रिटेन की रानी को पासपोर्ट और वीजा की जरूरत नहीं होती है अगर दोनों बाते सही है तो 15 अगस्त 1947 को हमारी आज़ादी की बात कही जाती है वो झूठ है | और Commonwealth Nations में हमारी एंट्री जो है वो एक Dominion State के रूप में है न क़ि Independent Nation के रूप में| इस देश में प्रोटोकोल है क़ि जब भी नए राष्ट्रपति बनेंगे तो 21 तोपों की सलामी दी जाएगी उसके अलावा किसी को भी नहीं | लेकिन ब्रिटेन की महारानी आती है तो उनको भी 21 तोपों की सलामी दी जाती है, इसका क्या मतलब है? और पिछली बार ब्रिटेन की महारानी यहाँ आयी थी तो एक निमंत्रण पत्र छपा था और उस निमंत्रण पत्र में ऊपर जो नाम था वो ब्रिटेन की महारानी का था और उसके नीचे भारत के राष्ट्रपति का नाम था मतलब हमारे देश का राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक नहीं है | ये है राजनितिक गुलामी, हम कैसे माने क़ि हम एक स्वतंत्र देश में रह रहे हैं | एक शब्द आप सुनते होंगे High Commission ये अंग्रेजों का एक गुलाम देश दुसरे गुलाम देश के यहाँ खोलता है लेकिन इसे Embassy नहीं कहा जाता | एक मानसिक गुलामी का उदहारण भी देखिये ....... हमारे यहाँ के अख़बारों में आप देखते होंगे क़ि कैसे शब्द प्रयोग होते हैं - (ब्रिटेन की महारानी नहीं) महारानी एलिज़ाबेथ, (ब्रिटेन के प्रिन्स चार्ल्स नहीं) प्रिन्स चार्ल्स , (ब्रिटेन की प्रिंसेस नहीं) प्रिंसेस डैना (अब तो वो हैं नहीं), अब तो एक और प्रिन्स विलियम भी आ गए है |
भारत का नाम INDIA रहेगा और सारी दुनिया में भारत का नाम इंडिया प्रचारित किया जायेगा और सारे सरकारी दस्तावेजों में इसे इंडिया के ही नाम से संबोधित किया जायेगा | हमारे और आपके लिए ये भारत है लेकिन दस्तावेजों में ये इंडिया है | संविधान के प्रस्तावना में ये लिखा गया है "India that is Bharat " जब क़ि होना ये चाहिए था "Bharat that was India " लेकिन दुर्भाग्य इस देश का क़ि ये भारत के जगह इंडिया हो गया | ये इसी संधि के शर्तों में से एक है | अब हम भारत के लोग जो इंडिया कहते हैं वो कहीं से भी भारत नहीं है | कुछ दिन पहले मैं एक लेख पढ़ रहा था अब किसका था याद नहीं आ रहा है उसमे उस व्यक्ति ने बताया था कि इंडिया का नाम बदल के भारत कर दिया जाये तो इस देश में आश्चर्यजनक बदलाव आ जायेगा और ये विश्व की बड़ी शक्ति बन जायेगा अब उस शख्स के बात में कितनी सच्चाई है मैं नहीं जानता, लेकिन भारत जब तक भारत था तब तक तो दुनिया में सबसे आगे था और ये जब से इंडिया हुआ है तब से पीछे, पीछे और पीछे ही होता जा रहा है |

भारत के संसद में वन्दे मातरम नहीं गया जायेगा अगले 50 वर्षों तक यानि 1997 तक | 1997 में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने इस मुद्दे को संसद में उठाया तब जाकर पहली बार इस तथाकथित आजाद देश की संसद में वन्देमातरम गाया गया | 50 वर्षों तक नहीं गाया गया क्योंकि ये भी इसी संधि की शर्तों में से एक है | और वन्देमातरम को ले के मुसलमानों में जो भ्रम फैलाया गया वो अंग्रेजों के दिशानिर्देश पर ही हुआ था | इस गीत में कुछ भी ऐसा आपत्तिजनक नहीं है जो मुसलमानों के दिल को ठेस पहुचाये | आपत्तिजनक तो जन,गन,मन में है जिसमे एक शख्स को भारत भाग्यविधाता यानि भारत के हर व्यक्ति का भगवान बताया गया है या कहें भगवान से भी बढ़कर |

इस संधि की शर्तों के अनुसार सुभाष चन्द्र बोस को जिन्दा या मुर्दा अंग्रेजों के हवाले करना था | यही वजह रही क़ि सुभाष चन्द्र बोस अपने देश के लिए लापता रहे और कहाँ मर खप गए ये आज तक किसी को मालूम नहीं है | समय समय पर कई अफवाहें फैली लेकिन सुभाष चन्द्र बोस का पता नहीं लगा और न ही किसी ने उनको ढूँढने में रूचि दिखाई | मतलब भारत का एक महान स्वतंत्रता सेनानी अपने ही देश के लिए बेगाना हो गया | सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिंद फौज बनाई थी ये तो आप सब लोगों को मालूम होगा ही लेकिन महत्वपूर्ण बात ये है क़ि ये 1942 में बनाया गया था और उसी समय द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था और सुभाष चन्द्र बोस ने इस काम में जर्मन और जापानी लोगों से मदद ली थी जो कि अंग्रेजो के दुश्मन थे और इस आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया था | और जर्मनी के हिटलर और इंग्लैंड के एटली और चर्चिल के व्यक्तिगत विवादों की वजह से ये द्वितीय विश्वयुद्ध हुआ था और दोनों देश एक दुसरे के कट्टर दुश्मन थे | एक दुश्मन देश की मदद से सुभाष चन्द्र बोस ने अंग्रेजों के नाकों चने चबवा दिए थे | एक तो अंग्रेज उधर विश्वयुद्ध में लगे थे दूसरी तरफ उन्हें भारत में भी सुभाष चन्द्र बोस की वजह से परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था | इसलिए वे सुभाष चन्द्र बोस के दुश्मन थे |

इस संधि की शर्तों के अनुसार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकुल्लाह, रामप्रसाद विस्मिल जैसे लोग आतंकवादी थे और यही हमारे syllabus में पढाया जाता था बहुत दिनों तक | और अभी एक महीने पहले तक ICSE बोर्ड के किताबों में भगत सिंह को आतंकवादी ही बताया जा रहा था, वो तो भला हो कुछ लोगों का जिन्होंने अदालत में एक केस किया और अदालत ने इसे हटाने का आदेश दिया है (ये समाचार मैंने इन्टरनेट पर ही अभी कुछ दिन पहले देखा था) |

आप भारत के सभी बड़े रेलवे स्टेशन पर एक किताब की दुकान देखते होंगे "व्हीलर बुक स्टोर" वो इसी संधि की शर्तों के अनुसार है | ये व्हीलर कौन था ? ये व्हीलर सबसे बड़ा अत्याचारी था | इसने इस देश क़ि हजारों माँ, बहन और बेटियों के साथ बलात्कार किया था | इसने किसानों पर सबसे ज्यादा गोलियां चलवाई थी | 1857 की क्रांति के बाद कानपुर के नजदीक बिठुर में व्हीलर और नील नामक दो अंग्रजों ने यहाँ के सभी 24 हजार लोगों को जान से मरवा दिया था चाहे वो गोदी का बच्चा हो या मरणासन्न हालत में पड़ा कोई बुड्ढा | इस व्हीलर के नाम से इंग्लैंड में एक एजेंसी शुरू हुई थी और वही भारत में आ गयी | भारत आजाद हुआ तो ये ख़त्म होना चाहिए था, नहीं तो कम से कम नाम भी बदल देते | लेकिन वो नहीं बदला गया क्योंकि ये इस संधि में है |
इस संधि की शर्तों के अनुसार अंग्रेज देश छोड़ के चले जायेगे लेकिन इस देश में कोई भी कानून चाहे वो किसी क्षेत्र में हो नहीं बदला जायेगा | इसलिए आज भी इस देश में 34735 कानून वैसे के वैसे चल रहे हैं जैसे अंग्रेजों के समय चलता था | Indian Police Act, Indian Civil Services Act (अब इसका नाम है Indian Civil Administrative Act), Indian Penal Code (Ireland में भी IPC चलता है और Ireland में जहाँ "I" का मतलब Irish है वही भारत के IPC में "I" का मतलब Indian है बाकि सब के सब कंटेंट एक ही है, कौमा और फुल स्टॉप का भी अंतर नहीं है) Indian Citizenship Act, Indian Advocates Act, Indian Education Act, Land Acquisition Act, Criminal Procedure Act, Indian Evidence Act, Indian Income Tax Act, Indian Forest Act, Indian Agricultural Price Commission Act सब के सब आज भी वैसे ही चल रहे हैं बिना फुल स्टॉप और कौमा बदले हुए |
इस संधि के अनुसार अंग्रेजों द्वारा बनाये गए भवन जैसे के तैसे रखे जायेंगे | शहर का नाम, सड़क का नाम सब के सब वैसे ही रखे जायेंगे | आज देश का संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, राष्ट्रपति भवन कितने नाम गिनाऊँ सब के सब वैसे ही खड़े हैं और हमें मुंह चिढ़ा रहे हैं | लार्ड डलहौजी के नाम पर डलहौजी शहर है , वास्को डी गामा नामक शहर है (हाला क़ि वो पुर्तगाली था ) रिपन रोड, कर्जन रोड, मेयो रोड, बेंटिक रोड, (पटना में) फ्रेजर रोड, बेली रोड, ऐसे हजारों भवन और रोड हैं, सब के सब वैसे के वैसे ही हैं | आप भी अपने शहर में देखिएगा वहां भी कोई न कोई भवन, सड़क उन लोगों के नाम से होंगे | हमारे गुजरात में एक शहर है सूरत, इस सूरत शहर में एक बिल्डिंग है उसका नाम है कूपर विला | अंग्रेजों को जब जहाँगीर ने व्यापार का लाइसेंस दिया था तो सबसे पहले वो सूरत में आये थे और सूरत में उन्होंने इस बिल्डिंग का निर्माण किया था | ये गुलामी का पहला अध्याय आज तक सूरत शहर में खड़ा है |

हमारे यहाँ शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजों की है क्योंकि ये इस संधि में लिखा है और मजे क़ि बात ये है क़ि अंग्रेजों ने हमारे यहाँ एक शिक्षा व्यवस्था दी और अपने यहाँ अलग किस्म क़ि शिक्षा व्यवस्था रखी है | हमारे यहाँ शिक्षा में डिग्री का महत्व है और उनके यहाँ ठीक उल्टा है | मेरे पास ज्ञान है और मैं कोई अविष्कार करता हूँ तो भारत में पूछा जायेगा क़ि तुम्हारे पास कौन सी डिग्री है ? अगर नहीं है तो मेरे अविष्कार और ज्ञान का कोई मतलब नहीं है | जबकि उनके यहाँ ऐसा बिलकुल नहीं है आप अगर कोई अविष्कार करते हैं और आपके पास ज्ञान है लेकिन कोई डिग्री नहीं हैं तो कोई बात नहीं आपको प्रोत्साहित किया जायेगा | नोबेल पुरस्कार पाने के लिए आपको डिग्री की जरूरत नहीं होती है | हमारे शिक्षा तंत्र को अंग्रेजों ने डिग्री में बांध दिया था जो आज भी वैसे के वैसा ही चल रहा है | ये जो 30 नंबर का पास मार्क्स आप देखते हैं वो उसी शिक्षा व्यवस्था क़ि देन है, मतलब ये है क़ि आप भले ही 70 नंबर में फेल है लेकिन 30 नंबर लाये है तो पास हैं, ऐसा शिक्षा तंत्र से सिर्फ गदहे ही पैदा हो सकते हैं और यही अंग्रेज चाहते थे | आप देखते होंगे क़ि हमारे देश में एक विषय चलता है जिसका नाम है Anthropology | जानते है इसमें क्या पढाया जाता है ? इसमें गुलाम लोगों क़ि मानसिक अवस्था के बारे में पढाया जाता है | और ये अंग्रेजों ने ही इस देश में शुरू किया था और आज आज़ादी के 64 साल बाद भी ये इस देश के विश्वविद्यालयों में पढाया जाता है और यहाँ तक क़ि सिविल सर्विस की परीक्षा में भी ये चलता है |

इस संधि की शर्तों के हिसाब से हमारे देश में आयुर्वेद को कोई सहयोग नहीं दिया जायेगा मतलब हमारे देश की विद्या हमारे ही देश में ख़त्म हो जाये ये साजिस की गयी | आयुर्वेद को अंग्रेजों ने नष्ट करने का भरसक प्रयास किया था लेकिन ऐसा कर नहीं पाए | दुनिया में जितने भी पैथी हैं उनमे ये होता है क़ि पहले आप बीमार हों तो आपका इलाज होगा लेकिन आयुर्वेद एक ऐसी विद्या है जिसमे कहा जाता है क़ि आप बीमार ही मत पड़िए | आपको मैं एक सच्ची घटना बताता हूँ -जोर्ज वाशिंगटन जो क़ि अमेरिका का पहला राष्ट्रपति था वो दिसम्बर 1799 में बीमार पड़ा और जब उसका बुखार ठीक नहीं हो रहा था तो उसके डाक्टरों ने कहा क़ि इनके शरीर का खून गन्दा हो गया है जब इसको निकाला जायेगा तो ये बुखार ठीक होगा और उसके दोनों हाथों क़ि नसें डाक्टरों ने काट दी और खून निकल जाने की वजह से जोर्ज वाशिंगटन मर गया | ये घटना 1799 की है और 1780 में एक अंग्रेज भारत आया था और यहाँ से प्लास्टिक सर्जरी सीख के गया था | मतलब कहने का ये है क़ि हमारे देश का चिकित्सा विज्ञान कितना विकसित था उस समय | और ये सब आयुर्वेद की वजह से था और उसी आयुर्वेद को आज हमारे सरकार ने हाशिये पर पंहुचा दिया है |

इस संधि के हिसाब से हमारे देश में गुरुकुल संस्कृति को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जायेगा | हमारे देश के समृद्धि और यहाँ मौजूद उच्च तकनीक की वजह ये गुरुकुल ही थे | और अंग्रेजों ने सबसे पहले इस देश की गुरुकुल परंपरा को ही तोडा था, मैं यहाँ लार्ड मेकॉले की एक उक्ति को यहाँ बताना चाहूँगा जो उसने 2 फ़रवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में दिया था, उसने कहा था "“I have traveled across the length and breadth of India and have not seen one person who is a beggar, who is a thief, such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such caliber, that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation” | गुरुकुल का मतलब हम लोग केवल वेद, पुराण,उपनिषद ही समझते हैं जो की हमारी मुर्खता है अगर आज की भाषा में कहूं तो ये गुरुकुल जो होते थे वो सब के सब Higher Learning Institute हुआ करते थे |
इस संधि में एक और खास बात है | इसमें कहा गया है क़ि अगर हमारे देश के (भारत के) अदालत में कोई ऐसा मुक़दमा आ जाये जिसके फैसले के लिए कोई कानून न हो इस देश में या उसके फैसले को लेकर संबिधान में भी कोई जानकारी न हो तो साफ़ साफ़ संधि में लिखा गया है क़ि वो सारे मुकदमों का फैसला अंग्रेजों के न्याय पद्धति के आदर्शों के आधार पर ही होगा, भारतीय न्याय पद्धति का आदर्श उसमे लागू नहीं होगा | कितनी शर्मनाक स्थिति है ये क़ि हमें अभी भी अंग्रेजों का ही अनुसरण करना होगा |
भारत में आज़ादी की लड़ाई हुई तो वो ईस्ट इंडिया कम्पनी के खिलाफ था और संधि के हिसाब से ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारत छोड़ के जाना था और वो चली भी गयी लेकिन इस संधि में ये भी है क़ि ईस्ट इंडिया कम्पनी तो जाएगी भारत से लेकिन बाकि 126 विदेशी कंपनियां भारत में रहेंगी और भारत सरकार उनको पूरा संरक्षण देगी | और उसी का नतीजा है क़ि ब्रुक बोंड, लिप्टन, बाटा, हिंदुस्तान लीवर (अब हिंदुस्तान यूनिलीवर) जैसी 126 कंपनियां आज़ादी के बाद इस देश में बची रह गयी और लुटती रही और आज भी वो सिलसिला जारी है |
अंग्रेजी का स्थान अंग्रेजों के जाने के बाद वैसे ही रहेगा भारत में जैसा क़ि अभी (1946 में) है और ये भी इसी संधि का हिस्सा है | आप देखिये क़ि हमारे देश में, संसद में, न्यायपालिका में, कार्यालयों में हर कहीं अंग्रेजी, अंग्रेजी और अंग्रेजी है जब क़ि इस देश में 99% लोगों को अंग्रेजी नहीं आती है | और उन 1% लोगों क़ि हालत देखिये क़ि उन्हें मालूम ही नहीं रहता है क़ि उनको पढना क्या है और UNO में जा के भारत के जगह पुर्तगाल का भाषण पढ़ जाते हैं |
आप में से बहुत लोगों को याद होगा क़ि हमारे देश में आजादी के 50 साल बाद तक संसद में वार्षिक बजट शाम को 5:00 बजे पेश किया जाता था | जानते है क्यों ? क्योंकि जब हमारे देश में शाम के 5:00 बजते हैं तो लन्दन में सुबह के 11:30 बजते हैं और अंग्रेज अपनी सुविधा से उनको सुन सके और उस बजट की समीक्षा कर सके | इतनी गुलामी में रहा है ये देश | ये भी इसी संधि का हिस्सा है |
1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ तो अंग्रेजों ने भारत में राशन कार्ड का सिस्टम शुरू किया क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों को अनाज क़ि जरूरत थी और वे ये अनाज भारत से चाहते थे | इसीलिए उन्होंने यहाँ जनवितरण प्रणाली और राशन कार्ड क़ि शुरुआत क़ि | वो प्रणाली आज भी लागू है इस देश में क्योंकि वो इस संधि में है | और इस राशन कार्ड को पहचान पत्र के रूप में इस्तेमाल उसी समय शुरू किया गया और वो आज भी जारी है | जिनके पास राशन कार्ड होता था उन्हें ही वोट देने का अधिकार होता था | आज भी देखिये राशन कार्ड ही मुख्य पहचान पत्र है इस देश में |

अंग्रेजों के आने के पहले इस देश में गायों को काटने का कोई कत्लखाना नहीं था | मुगलों के समय तो ये कानून था क़ि कोई अगर गाय को काट दे तो उसका हाथ काट दिया जाता था | अंग्रेज यहाँ आये तो उन्होंने पहली बार कलकत्ता में गाय काटने का कत्लखाना शुरू किया, पहला शराबखाना शुरू किया, पहला वेश्यालय शुरू किया और इस देश में जहाँ जहाँ अंग्रेजों की छावनी हुआ करती थी वहां वहां वेश्याघर बनाये गए, वहां वहां शराबखाना खुला, वहां वहां गाय के काटने के लिए कत्लखाना खुला | ऐसे पुरे देश में 355 छावनियां थी उन अंग्रेजों के | अब ये सब क्यों बनाये गए थे ये आप सब आसानी से समझ सकते हैं | अंग्रेजों के जाने के बाद ये सब ख़त्म हो जाना चाहिए था लेकिन नहीं हुआ क्योंक़ि ये भी इसी संधि में है |
हमारे देश में जो संसदीय लोकतंत्र है वो दरअसल अंग्रेजों का वेस्टमिन्स्टर सिस्टम है | ये अंग्रेजो के इंग्लैंड क़ि संसदीय प्रणाली है | ये कहीं से भी न संसदीय है और न ही लोकतान्त्रिक है| लेकिन इस देश में वही सिस्टम है क्योंकि वो इस संधि में कहा गया है | और इसी वेस्टमिन्स्टर सिस्टम को महात्मा गाँधी बाँझ और वेश्या कहते थे (मतलब आप समझ गए होंगे) |

ऐसी हजारों शर्तें हैं | मैंने अभी जितना जरूरी समझा उतना लिखा है | मतलब यही है क़ि इस देश में जो कुछ भी अभी चल रहा है वो सब अंग्रेजों का है हमारा कुछ नहीं है | अब आप के मन में ये सवाल हो रहा होगा क़ि पहले के राजाओं को तो अंग्रेजी नहीं आती थी तो वो खतरनाक संधियों (साजिस) के जाल में फँस कर अपना राज्य गवां बैठे लेकिन आज़ादी के समय वाले नेताओं को तो अच्छी अंग्रेजी आती थी फिर वो कैसे इन संधियों के जाल में फँस गए | इसका कारण थोडा भिन्न है क्योंकि आज़ादी के समय वाले नेता अंग्रेजों को अपना आदर्श मानते थे इसलिए उन्होंने जानबूझ कर ये संधि क़ि थी | वो मानते थे क़ि अंग्रेजों से बढियां कोई नहीं है इस दुनिया में | भारत की आज़ादी के समय के नेताओं के भाषण आप पढेंगे तो आप पाएंगे क़ि वो केवल देखने में ही भारतीय थे लेकिन मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे | वे कहते थे क़ि सारा आदर्श है तो अंग्रेजों में, आदर्श शिक्षा व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श अर्थव्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श चिकित्सा व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श कृषि व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श न्याय व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श कानून व्यवस्था है तो अंग्रेजों की | हमारे आज़ादी के समय के नेताओं को अंग्रेजों से बड़ा आदर्श कोई दिखता नहीं था और वे ताल ठोक ठोक कर कहते थे क़ि हमें भारत अंग्रेजों जैसा बनाना है | अंग्रेज हमें जिस रस्ते पर चलाएंगे उसी रास्ते पर हम चलेंगे | इसीलिए वे ऐसी मूर्खतापूर्ण संधियों में फंसे | अगर आप अभी तक उन्हें देशभक्त मान रहे थे तो ये भ्रम दिल से निकाल दीजिये | और आप अगर समझ रहे हैं क़ि वो ABC पार्टी के नेता ख़राब थे या हैं तो XYZ पार्टी के नेता भी दूध के धुले नहीं हैं | आप किसी को भी अच्छा मत समझिएगा क्योंक़ि आज़ादी के बाद के इन 64 सालों में सब ने चाहे वो राष्ट्रीय पार्टी हो या प्रादेशिक पार्टी, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता का स्वाद तो सबो ने चखा ही है | खैर ...............

तो भारत क़ि गुलामी जो अंग्रेजों के ज़माने में थी, अंग्रेजों के जाने के 64 साल बाद आज 2011 में जस क़ि तस है क्योंकि हमने संधि कर रखी है और देश को इन खतरनाक संधियों के मकडजाल में फंसा रखा है | बहुत दुःख होता है अपने देश के बारे जानकार और सोच कर | मैं ये सब कोई ख़ुशी से नहीं लिखता हूँ ये मेरे दिल का दर्द होता है जो मैं आप लोगों से शेयर करता हूँ |

ये सब बदलना जरूरी है लेकिन हमें सरकार नहीं व्यवस्था बदलनी होगी और आप अगर सोच रहे हैं क़ि कोई मसीहा आएगा और सब बदल देगा तो आप ग़लतफ़हमी में जी रहे हैं | कोई हनुमान जी, कोई राम जी, या कोई कृष्ण जी नहीं आने वाले | आपको और हमको ही ये सारे अवतार में आना होगा, हमें ही सड़कों पर उतरना होगा और और इस व्यवस्था को जड मूल से समाप्त करना होगा | भगवान भी उसी की मदद करते हैं जो अपनी मदद स्वयं करता है |

इतने लम्बे पत्र को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद् | और अच्छा लगा हो तो इसे फॉरवर्ड कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये (अंग्रेजी छोड़ कर), अपने अपने ब्लॉग पर डालिए, मेरा नाम हटाइए अपना नाम डालिए मुझे कोई आपत्ति नहीं है | मतलब बस इतना ही है की ज्ञान का प्रवाह होते रहने दीजिये |

हिन्दुस्तान में गौ-हत्या

भारत को अस्थिर करने की योजना का एक भाग के रूप में गौ हत्या शुरू की गई। भारत में पहली क़साईख़ाना 1760 में शुरू किया गया था, एक क्षमता के साथ प्रति दिन 30,000 (हज़ार तीस केवल), कम से कम एक करोड़ गायों को एक साल में मारा गया ! एक सवाल के जवाब में गांधीजी ने कहा था कि जिस दिन भारत स्वतंत्रत हो जायेगा उसी दिन से भारत में सभी वध घरों को बंद किया जाएगा, 1929 में एक सार्वजनिक सभा में नेहरू ने कहा कि अगर वह भारत का प्रधानमंत्री बने तो वह पहला काम इन कसाईखानो को बंद करने का करेंगे, इन 63 सालों में 75 करोड गायों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। 1947 के बाद से संख्या 350 से 36,000 तक बढ़ गई है सरकार की अनुमति से 36,000 कतलखाने चल रहे हैं इसके इलावा जो अवैध रूप से चल रहे है वो अलग है उनकी संख्या की कोई पूरी जानकारी नही है।

गौहत्या पर प्रतिबंध के खिलाफ गांधी – नेहरू परिवार

15 अगस्त 1947 को भारत के आजाद होने पर देश के कोने – कोने से लाखों पत्र और तार प्रायः सभी जागरूक व्यक्तियों तथा सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा भारतीय संविधान परिषद के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के माध्यम से गांधी जी को भेजे गये जिसमें उन्होंने मांग की थी कि अब देश स्वतन्त्र हो गया हैं अतः गौहत्या को बन्द करा दो । तब गांधी जी ने कहा कि -

” हिन्दुस्तान में गौ-हत्या रोकने का कोई कानून बन ही नहीं सकता । इसका मतलब तो जो हिन्दू नहीं हैं उनके साथ जबरदस्ती करना होगा । ” – ‘ प्रार्थना सभा ‘ ( 25 जुलाई 1947 )

अपनी 4 नवम्बर 1947 की प्रार्थना सभा में गांधी जी ने फिर कहा कि -

” भारत कोई हिन्दू धार्मिक राज्य नहीं हैं , इसलिए हिन्दुओं के धर्म को दूसरों पर जबरदस्ती नहीं थोपा जा सकता । मैं गौ सेवा में पूरा विश्वास रखता हूँ , परन्तु उसे कानून द्वारा बन्द नहीं किया जा सकता । “

इससे स्पष्ट हैं कि गांधी जी की गौरक्षा के प्रति कोई आस्था नहीं थी । वह केवल हिन्दुओं की भावनाओं का शौषण करने के लिए बनावटी तौर पर ही गौरक्षा की बात किया करते थे , इसलिए उपयुक्त समय आने पर देश की सनातन आस्थाओं के साथ विश्वासघात कर गये ।

(विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार)

नाथूराम गोडसे और गाँधी---- भाग १


नाथूराम गोडसे एक ऐसा नाम है जिसको सुनते ही लोगो के मस्तिष्क में एक ही विचार आता है कि गाँधी का हत्यारा। हमारे इतिहास में भी गोडसे का इतिहास एक ही पंक्ति में समाप्त हो जाता है। गोडसे ने गाँधी वध क्यों किया, इसके पीछे क्या कारण रहे , इन बातों का कही भी व्याख्या नही की जाती। 

गोडसे ने गाँधी के वध करने के १५० कारण न्यायालय के समक्ष बताये थे। उन्होंने जज से आज्ञा प्राप्त कर ली थी कि वे अपने बयानों को पढ़कर सुनाना चाहते है । अतः उन्होंने वो १५० बयान माइक पर पढ़कर सुनाए। लेकिन कांग्रेस सरकार ने (डर से) नाथूराम गोडसे के गाँधी वध के कारणों पर बैन लगा दिया कि वे बयां भारत की जनता के समक्ष न पहुँच पायें। गोडसे के उन बयानों में से कुछ बयान क्रमबद्ध रूप में, में लगभग १० भागों में आपके समक्ष प्रस्तुत करूंगा। आप स्वं ही विचार कर सकते है कि गोडसे के बयानों पर नेहरू ने क्यो रोक लगाई ?और गाँधी वध उचित था या अनुचित।

अनुच्छेद, १५ व १६.............................."इस बात को तो मै सदा बिना छिपाए कहता रहा हूँ कि में गाँधी जी के सिद्धांतों के विरोधी सिद्धांतों का प्रचार कर रहा हूँ। मेरा यह पूर्ण विशवास रहा है कि अहिंसा का अत्यधिक प्रचार हिदू जाति को अत्यन्त निर्बल बना देगा और अंत में यह जाति ऐसी भी नही रहेगी कि वह दूसरी जातियों से ,विशेषकर मुसलमानों के अत्त्याचारों का प्रतिरोध कर सके।"-------------------------------------------------------------------"हम लोग गाँधी जी कि अहिंसा के ही विरोधी ही नही थे,प्रत्युत इस बात के अधिक विरोधी थे कि गाँधी जी अपने कार्यों व विचारों में मुसलमानों का अनुचित पक्ष लेते थे और उनके सिद्धांतों व कार्यों से हिंदू जाति कि अधिकाधिक हानि हो रही थी।" ---------------------------------
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अनुच्छेद, ६९ ..................................."३२ वर्ष से गाँधी जी मुसलमानों के पक्ष में जो कार्य कर रहे थे और अंत में उन्होंने जो पाकिस्तान को ५५ करोड़ रुपया दिलाने के लिए अनशन करने का निश्चय किया ,इन बातों ने मुझे विवश किया कि गाँधी जी को समाप्त कर देना चाहिए। "--------------------------------

अनुच्छेद,७०..भाग ख ........................"खिलाफत आन्दोलन जब असफल हो गया तो मुसलमानों को बहुत निराशा हुई और अपना क्रोध उन्होंने हिन्दुओं पर उतारा।--------------------------------"मालाबार,पंजाब,बंगाल , सीमाप्रांत में हिन्दुओं पर अत्यधिक अत्याचार हुए। जिसको मोपला विद्रोह के नाम से पुकारा जाता है। उसमे हिन्दुओं कि धन, संपत्ति व जीवन पर सबसे बड़ा आक्रमण हुआ। हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया,स्त्रियों के अपमान हुए। गाँधी जी अपनी निति के कारण इसके उत्तरदायी थे,मौन रहे।"-----------------------------"प्रत्युत यह कहना शुरू कर दिया कि मालाबार में हिन्दुओं को मुस्लमान नही बनाया गया।यद्यपि उनके मुस्लिम मित्रों ने ये स्वीकार किया कि मुसलमान बनाने कि सैकडो घटनाएं हुई है। ---------------------------------------------और उल्टे मोपला मुसलमानों के लिए फंड शुरू कर दिया। "------------

नाथूराम गोडसे व गाँधी ........भाग २



जैसा की पिछले भाग में बताया गया है कि गोडसे गाँधी की मुस्लिम तुस्टीकरण की निति से किस प्रकार छुब्द था अब उससे आगे के बयान ...................................

अनुच्छेद ७० का भाग ग ........................जब खिलाफत आन्दोलन असफल हो गया ----------------------------------------------इस ध्येय के लिए गाँधी अली भाइयों ने गुप्त से अफगानिस्तान के अमीर को भारत पर हमला करने का निमंत्रण दिया.इस षड़यंत्र के पीछे बहुत बड़ा इतिहास है। ----------------------------------------गाँधी जी के एक लेख का अंश नीचे दिया जा रहा है................."मै नही समझता कि जैसे ख़बर फैली है,अली भाइयों को क्यो जेल मे डाला जाएगा और मै आजाद रहूँगा?उन्होंने ऐसा कोई कार्य नही किया है कि जो मे न करू। यदि उन्होंने अमीर अफगानिस्तान को आक्रमण के लिए संदेश भेजा है,तो मै भी उसके पास संदेश भेज दूँगा कि जब वो भारत आयेंगे तो जहाँ तक मेरा बस चलेगा एक भी भारतवासी उनको हिंद से बहार निकालने में सरकार कि सहायता नही करेगा।"

अनुच्छेद ७० का भाग ठ........................हिन्दी के विरूद्ध हिदुस्तानी ----------------राष्ट्र भाषा के प्रश्न पर गाँधी जी ने मुसलमानों का जिस प्रकार अनुचित पक्षलिया------------------किसी भी द्रष्टि से देखा जाय तो राष्ट्रभाषा बनने का अधिकार हिन्दी को है। परंतु मुसलमानों खुश करने के लिए वे हिन्दुस्तानी का प्रचार करने लगे------------------------------यानि बादशाह राम व बेगम सीता जैसे शब्दों का प्रयोग होने लगा। ------------------------हिन्दुस्तानी के रूप में स्कूलों में पढ़ाई जाने लगी इससे कोई लाभ नही था ,प्रत्युत इसलिए की मुस्लमान खुश हो सके। इससे अधिक सांप्रदायिक अत्याचार और क्या होगा? ----------------------------------

अनुच्छेद ७० का भाग ड................................न गाओ वन्देमातरम ----------------कितनी लज्जा जनक बात है की मुस्लमान वन्देमातरम पसंद नही करते। गाँधी जी पर जहाँ तक हो सका उसे बंद करा दिया। ------------------------------------------------

अनुच्छेद ७० का भाग ढ ......................................गाँधी ने शिवबवनी पर रोक लगवा दी ------------------------शिवबवनी ५२ छंदों का एक संग्रह है,जिसमे शिवाजी महाराज की प्रशंसा की गई है.---------------इसमे एक छंद में कहा गया है की अगर शिवाजी न होते तो सारा देश मुस्लमान हो जाता। ---------------------इतिहास और हिंदू धर्म के दमन के अतिरिक्त उनके सामने कोई सरल मार्ग न था।

अनुच्छेद ७० का भाग फ ..................................कश्मीर के विषय में गाँधी हमेशा ये कहते रहे की सत्ता शेख अब्दुल्ला को सौप दी जाय, केवल इसलिए की कश्मीर में मुसाल्मान अधिक है। इसलिए गाँधी जी का मत था की महाराज हरी सिंह को सन्यास लेकर काशी चले जन चाहिए,परन्तु हैदराबाद के विषय में गाँधी की निति भिन्न थी। यद्यपि वहां हिन्दुओं की जनसँख्या अधिक थी ,परन्तु गाँधी जी ने कभी नही कहा की निजाम फकीरी लेकर मक्का चला जाय।

अनुच्छेद ७० का भाग म ..............................कोंग्रेस ने गाँधी जी को सम्मान देने के लिए चरखे वाले झंडे को राष्ट्रिय ध्वज बनाया। प्रत्येक अधिवेशन में प्रचुर मात्रा में ये झंडे लगाये जाते थे. -------------------------------इस झंडे के साथ कोंग्रेस का अति घनिष्ट समबन्ध था। नोआखली के १९४६ के दंगों के बाद वह ध्वज गाँधी जी की कुटिया पर भी लहरा रहा था, परन्तु जब एक मुस्लमान को ध्वज के लहराने से आपत्ति हुई तो गाँधी ने तत्काल उसे उतरवा दिया। इस प्रकार लाखों करोडो देशवासियों की इस ध्वज के प्रति श्रद्धा को अपमानित किया। केवल इसलिए की ध्वज को उतरने से एक मुस्लमान खुश होता था।

अनुच्छेद ७८ .........................गाँधी जी -----------------------------सुभाषचंद्र बोस अध्यक्ष पद पर रहते हुए गाँधी जी की निति पर नही चले। फ़िर भी वे इतने लोकप्रिय हुए की गाँधी जी की इच्छा के विपरीत पत्ताभी सीतारमैया के विरोध में प्रबल बहुमत से चुने गए ------------------------गाँधी जी को दुःख हुआ.उन्होंने कहा की सुभाष की जीत गाँधी की हार है। -----------------जिस समय तक सुभाष बोस को कोंग्रेस की गद्दी से नही उतरा गया तब तक गाँधी का क्रोध शांत नही हुआ।

अनुच्छेद ८५ .......................मुस्लिम लीग देश की शान्ति को भंग कर रही थी। और हिन्दुओं पर अत्याचार कर रही थी। -------------------कोंग्रेस इन अत्याचारों को रोकने के लिए कुछ भी नही करना चाहती थी,क्यो की वह मुसलमानों को प्रसन्न रखना चाहती थी। गाँधी जी जिस बात को अपने अनुकूल नही पते थे ,उसे दबा देते थे। इसलिए मुझे यह सुनकर आश्चर्य होता है की आजादी गाँधी जी ने प्राप्त की । मेरा विचार है की मुसलमानों के आगे झुकना आजादी के लिए लडाई नही थी।------------------गाँधी व उनके साथी सुभाष को नष्ट करना चाहते थे।

अनुच्छेद ८८ ..........................गाँधी जी के हिंदू मुस्लिम एकता का सिद्धांत तो उसी समय नष्ट हो गया, जिस समय पाकिस्तान बना। प्रारम्भ से ही मुस्लिम लीग का मत था की भारत एक देश नही है। ------------------------------------हिंदू तो गाँधी के परामर्श पर चलते रहे किंतु मुसलमानों ने गाँधी की तरफ़ ध्यान नही दिया और अपने व्यवहार से वे सदा हिन्दुओं का अपमान और अहित करते रहे और अंत में देश दो टुकडों में बँट गया।

केवल हिंदू ही राष्ट्र है.


किसी भी देश की उन्नति उस देश में रहने वाले उस समुदाय से होती है,जो कि उस देश की धरती को अपनी मात्र भूमि, पितृ भूमि व पुज्य्भूमि मानता है। जिसकी निष्ठां देश को समर्पित हो। भारत में रहने वाला ऐसा समाज केवल हिंदू है,और हिंदू की परिभाषा भी यही कहती है कि जो व्यक्ति भारत भूमि को अपनी मात्रभूमि, पितृ भूमि ,व पुण्यभूमि मानता है वह हिंदू है । ऐसे में कहा जा सकता है कि मुसलमान व इसाई को छोढ़कर भारत में प्रय्तेक पंथ को मानने वाला व्यक्ति, चाहे वह सनातनी हो,बोद्ध हो,जैन हो,सिक्ख हो , हिंदू है।
कुछ लोग इस बात को जरूर पूछना चाहेंगे की मुसलमान व इसाई हिंदू क्यो नही है? तो इसका कारण है उनकी पुन्य भूमि।एक मुसलमान मुसलमान पहले है भारतीय बाद में। क्यो कि भारत से ज्यादा उसका लगाव अरब से है ,मक्का से है। इसी प्रकार एक इसाई भारत से पहले जेरूसलम को पूजता है। उस पोप की आज्ञा उसकी उस राष्ट्रभक्ति पर भारी पड़ती है जो उसे वेटिकन सिटी से मिलती है।
भारत में जो भी हिस्सा हिंदू बहुल नही रहता वह हिस्सा या तो अलग हो जाता है या फ़िर अलग होने का प्रयास शुरू कर देता है। यूँ तो भारत में खालिस्तान की मांग भी उठी किंतु आम सिक्ख खालिस्तान का कभी समर्थक नही रहा। आज का जो पकिस्तान व बांग्लादेश है वह इस बात का सबसे बड़ा उदहारण है कि हिंदू कम होने पर वह हिस्सा भारत से कट गया। कश्मीर की समस्या पूरे विश्व के सामने है। इस समस्या का कारण सिर्फ़ वहाँ पर मुसलमानों की बहुलता होना है।आसाम की स्थिति भी मुस्लिमो की आबादी तेजी के साथ बढ़ने के कारण हाथ से निकलती जा रही है। वहां पर मुसलमानों ने चुनाव में अपने लिए अलग विधानसभा सीटों की मांग शुरू कर दी है।
नागालेंड,मिजोरम मेघालय की स्थिति इसलिए जटिल होती जा रही है क्यों कि ये राज्य इसाई बहुसंख्यक हो चुके है,और स्वतंत्र इसाई राष्ट्र की मांग कर रहे है। इनमे विदेशी पादरियों की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है।
स्वामी विवेकानंद के अनुसार "जब कोई हिंदू धर्म परिवर्तन करता है तब एक हिंदू ही कम नही होता ,बल्कि उसका एक शत्रु भी बढ़ जाता है। "
बाबा भीमराव आंबेडकर ने भी लिखा है कि "जब एक हिंदू का धर्मान्तरण होता है तो वह राष्ट्र वाद से बिल्कुल कट जाता है ।उसकी भक्ति मक्का व वेटिकन सिटी से जुड़ जाती है।
इन दो महापुरुषों ने भी यही बात अपने उपरोक्त शब्दों में स्पष्ट रूप से बता दी है कि भारत में राष्ट्र वाद केवल हिंदू में है। बाकि सब राष्ट्र विरोधी है।
भारत एक धर्मनिरपेक्स देश है। परन्तु देखिये की कश्मीर व नागालैंड में आप लोग जमीन नही खरीद सकते, केवल मात्र इसलिए की वो प्रदेश मुस्लिम बाहुल्य व इसाई बाहुल्य हैं।ये तो धर्म के नाम पर साफ बंटवारा है।
अतःस्पष्ट है की भारत में राष्ट्रवाद व हिंदू समाज दोनों ही एक शब्द के पर्यायवाची है। भारत में राष्ट्र व राष्ट्रवाद वहीं है जहाँ हिंदू बाहुल्य में है,अन्यथा भारत के कई टुकड़े हो चुके है।

रविवार, 23 जून 2013

सोनिया गाँधी को आप कितना जानते हैं? (भाग-४)

Know Sonia Gandhi (Part-4)

गतांक (सोनिया...भाग-३) से आगे जारी...

राजीव से विवाह के बाद सोनिया और उनके इटालियन मित्रों को स्नैम प्रोगैती की ओट्टावियो क्वात्रोची से भारी-भरकम राशियाँ मिलीं, वह भारतीय कानूनों से बेखौफ़ होकर दलाली में रुपये कूटने लगा। कुछ ही वर्षों में माइनो परिवार जो गरीबी के भंवर में फ़ँसा था अचानक करोड़पति हो गया । लोकसभा के नयेनवेले सदस्य के रूप में मैंने 19 नवम्बर 1974 को संसद में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी से पूछा था कि “क्या आपकी बहू सोनिया गाँधी, जो कि अपने-आप को एक इंश्योरेंस एजेंट बताती हैं (वे खुद को ओरियंटल फ़ायर एंड इंश्योरेंस कम्पनी की एजेंट बताती थीं), प्रधानमंत्री आवास का पता उपयोग कर रही हैं?” जबकि यह अपराध है क्योंकि वे एक इटालियन नागरिक हैं (और यह विदेशी मुद्रा उल्लंघन) का मामला भी बनता है”, तब संसद में बहुत शोरगुल मचा, श्रीमती इन्दिरा गाँधी गुस्सा तो बहुत हुईं, लेकिन उनके सामने और कोई विकल्प नहीं था, इसलिये उन्होंने लिखित में यह बयान दिया कि “यह गलती से हो गया था और सोनिया ने इंश्योरेंस कम्पनी से इस्तीफ़ा दे दिया है” (मेरे प्रश्न पूछने के बाद), लेकिन सोनिया का भारतीय कानूनों को लतियाने और तोड़ने का यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। 1977 में जनता पार्टी सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय के जस्टिस ए.सी.गुप्ता के नेतृत्व में गठित आयोग ने जो रिपोर्ट सौंपी थी, उसके अनुसार “मारुति” कम्पनी (जो उस वक्त गाँधी परिवार की मिल्कियत था) ने “फ़ेरा कानूनों, कम्पनी कानूनों और विदेशी पंजीकरण कानून के कई गंभीर उल्लंघन किये”, लेकिन ना तो संजय गाँधी और ना ही सोनिया गाँधी के खिलाफ़ कभी भी कोई केस दर्ज हुआ, ना मुकदमा चला। हालांकि यह अभी भी किया जा सकता है, क्योंकि भारतीय कानूनों के मुताबिक “आर्थिक घपलों” पर कार्रवाई हेतु कोई समय-सीमा तय नहीं है।

जनवरी 1980 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी पुनः सत्तासीन हुईं। सोनिया ने सबसे पहला काम यह किया कि उन्होंने अपना नाम “वोटर लिस्ट” में दर्ज करवाया, यह साफ़-साफ़ कानून का मखौल उड़ाने जैसा था और उनका वीसा रद्द किया जाना चाहिये था (क्योंकि उस वक्त भी वे इटली की नागरिक थीं)। प्रेस द्वारा हल्ला मचाने के बाद दिल्ली के चुनाव अधिकारी ने 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से हटाया। लेकिन फ़िर जनवरी 1983 में उन्होंने अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वा लिया, जबकि उस समय भी वे विदेशी ही थीं (आधिकारिक रूप से उन्होंने भारतीय नागरिकता के लिये अप्रैल 1983 में आवेद दिया था)। हाल ही में ख्यात कानूनविद, ए.जी.नूरानी ने अपनी पुस्तक “सिटीजन्स राईट्स, जजेस एंड अकाऊण्टेबिलिटी रेकॉर्ड्स” (पृष्ठ 318) पर यह दर्ज किया है कि “सोनिया गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल के कुछ खास कागजात एक विदेशी को दिखाये, जो कागजात उनके पास नहीं होने चाहिये थे और उन्हें अपने पास रखने का सोनिया को कोई अधिकार नहीं था।“ इससे साफ़ जाहिर होता है उनके मन में भारतीय कानूनों के प्रति कितना सम्मान है और वे अभी भी राजतंत्र की मानसिकता से ग्रस्त हैं। सार यह कि सोनिया गाँधी के मन में भारतीय कानून के सम्बन्ध में कोई इज्जत नहीं है, वे एक महारानी की तरह व्यवहार करती हैं। यदि भविष्य में उनके खिलाफ़ कोई मुकदमा चलता है और जेल जाने की नौबत आ जाती है तो वे इटली भी भाग सकती हैं। पेरू के राष्ट्रपति फ़ूजीमोरी जीवन भर यह जपते रहे कि वे जन्म से ही पेरूवासी हैं, लेकिन जब भ्रष्टाचार के मुकदमे में उन्हें दोषी पाया गया तो वे अपने गृह देश जापान भाग गये और वहाँ की नागरिकता ले ली।

भारत से घृणा करने वाले मुहम्मद गोरी, नादिर शाह और अंग्रेज रॉबर्ट क्लाइव ने भारत की धन-सम्पदा को जमकर लूटा, लेकिन सोनिया तो “भारतीय” हैं, फ़िर जब राजीव और इन्दिरा प्रधानमंत्री थे, तब बक्से के बक्से भरकर रोज-ब-रोज प्रधानमंत्री निवास से सुरक्षा गार्ड चेन्नई के हवाई अड्डे पर इटली जाने वाले हवाई जहाजों में क्या ले जाते थे? एक तो हमेशा उन बक्सों को रोम के लिये बुक किया जाता था, एयर इंडिया और अलिटालिया एयरलाईन्स को ही जिम्मा सौंपा जाता था और दूसरी बात यह कि कस्टम्स पर उन बक्सों की कोई जाँच नहीं होती थी। अर्जुन सिंह जो कि मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और संस्कृति मंत्री भी, इस मामले में विशेष रुचि लेते थे। कुछ भारतीय कलाकृतियाँ, पुरातन वस्तुयें, पिछवाई पेंटिंग्स, शहतूश शॉलें, सिक्के आदि इटली की दो दुकानों, (जिनकी मालिक सोनिया की बहन अनुस्का हैं) में आम तौर पर देखी जाती हैं। ये दुकानें इटली के आलीशान इलाकों रिवोल्टा (दुकान का नाम – एटनिका) और ओर्बेस्सानो (दुकान का नाम – गनपति) में स्थित हैं जहाँ इनका धंधा नहीं के बराबर चलता है, लेकिन दरअसल यह एक “आड़” है, इन दुकानों के नाम पर फ़र्जी बिल तैयार करवाये जाते हैं फ़िर वे बेशकीमती वस्तुयें लन्दन ले जाकर “सौथरबी और क्रिस्टीज” द्वारा नीलामी में चढ़ा दी जाती हैं, इन सबका क्या मतलब निकलता है? यह पैसा आखिर जाता कहाँ है? एक बात तो तय है कि राहुल गाँधी की हार्वर्ड की एक वर्ष की फ़ीस और अन्य खर्चों के लिये भुगतान एक बार केमैन द्वीप की किसी बैंक के खाते से हुआ था। इस सबकी शिकायत जब मैंने वाजपेयी सरकार में की तो उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया, इस पर मैंने दिल्ली हाइकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट की बेंच ने सरकार को नोटिस जारी किया, लेकिन तब तक सरकार गिर गई, फ़िर कोर्ट नें सीबीआई को निर्देश दिये कि वह इंटरपोल की मदद से इन बहुमूल्य वस्तुओं के सम्बन्ध में इटली सरकार से सहायता ले। इटालियन सरकार ने प्रक्रिया के तहत भारत सरकार से अधिकार-पत्र माँगा जिसके आधार पर इटली पुलिस एफ़आईआर दर्ज करे। अन्ततः इंटरपोल ने दो बड़ी रिपोर्टें कोर्ट और सीबीआई को सौंपी और न्यायाधीश ने मुझे उसकी एक प्रति देने को कहा, लेकिन आज तक सीबीआई ने मुझे वह नहीं दी, और यह सवाल अगली सुनवाई के दौरान फ़िर से पूछा जायेगा। सीबीआई का झूठ एक बार और तब पकड़ा गया, जब उसने कहा कि “अलेस्सान्द्रा माइनो” किसी पुरुष का नाम है, और “विया बेल्लिनी, 14, ओरबेस्सानो”, किसी गाँव का नाम है, ना कि “माईनो” परिवार का पता। बाद में सीबीआई के वकील ने कोर्ट से माफ़ी माँगी और कहा कि यह गलती से हो गया, उस वकील का “प्रमोशन” बाद में “ऎडिशनल सॉलिसिटर जनरल” के रूप में हो गया, ऐसा क्यों हुआ, इसका खुलासा तो वाजपेयी-सोनिया की आपसी “समझबूझ” और “गठजोड़” ही बता सकता है।

इन दिनों सोनिया गाँधी अपने पति हत्यारों के समर्थकों MDMK, PMK और DMK से सत्ता के लिये मधुर सम्बन्ध बनाये हुए हैं, कोई भारतीय विधवा कभी ऐसा नहीं कर सकती। उनका पूर्व आचरण भी ऐसे मामलों में संदिग्ध रहा है, जैसे कि – जब संजय गाँधी का हवाई जहाज नाक के बल गिरा तो उसमें विस्फ़ोट नहीं हुआ, क्योंकि पाया गया कि उसमें ईंधन नहीं था, जबकि फ़्लाईट रजिस्टर के अनुसार निकलते वक्त टैंक फ़ुल किया गया था, जैसे माधवराव सिंधिया की विमान दुर्घटना के ऐन पहले मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित को उनके साथ जाने से मना कर दिया गया। इन्दिरा गाँधी की मौत की वजह बना था उनका अत्यधिक रक्तस्राव, न कि सिर में गोली लगने से, फ़िर सोनिया गाँधी ने उस वक्त खून बहते हुए हालत में इन्दिरा गाँधी को लोहिया अस्पताल ले जाने की जिद की जो कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AAIMS) से बिलकुल विपरीत दिशा में है? और जबकि “ऐम्स” में तमाम सुविधायें भी उपलब्ध हैं, फ़िर लोहिया अस्पताल पहुँच कर वापस सभी लोग AAIMS पहुँचे, और इस बीच लगभग पच्चीस कीमती मिनट बरबाद हो गये? ऐसा क्यों हुआ, क्या आज तक किसी ने इसकी जाँच की? सोनिया गाँधी के विकल्प बन सकने वाले लगभग सभी युवा नेता जैसे राजेश पायलट, माधवराव सिन्धिया, जितेन्द्र प्रसाद विभिन्न हादसों में ही क्यों मारे गये? अब सोनिया की सत्ता निर्बाध रूप से चल रही है, लेकिन ऐसे कई अनसुलझे और रहस्यमयी प्रश्न चारों ओर मौजूद हैं, उनका कोई जवाब नहीं है, और कोई पूछने वाला भी नहीं है, यही इटली की स्टाइल है।

[आशा है कि मेरे कई “मित्रों” (?) को कई जवाब मिल गये होंगे, जो मैंने पिछली दोनो पोस्टों में जानबूझकर नहीं उठाये थे, यह भी आभास हुआ होगा कि कांग्रेस सांसद “सुब्बा” कैसे भारतीय नागरिक ना होते हुए भी सांसद बन गया (क्योंकि उसकी महारानी खुद कानून का सम्मान नहीं करती), क्यों बार-बार क्वात्रोच्ची सीबीआई के फ़ौलादी (!) हाथों से फ़िसल जाता है, क्यों कांग्रेस और भाजपा एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं? क्यों हमारी सीबीआई इतनी लुंज-पुंज है? आदि-आदि... मेरा सिर्फ़ यही आग्रह है कि किसी को भी तड़ से “सांप्रदायिक या फ़ासिस्ट” घोषित करने से पहले जरा ठंडे दिमाग से सोच लें, तथ्यों पर गौर करें, कई बार हमें जो दिखाई देता है सत्य उससे कहीं अधिक भयानक होता है, और सत्ता के शीर्ष शिखरों पर तो इतनी सड़ांध और षडयंत्र हैं कि हम जैसे आम आदमी कल्पना भी नहीं कर सकते, बल्कि यह कहना गैरवाजिब नहीं होगा कि सत्ता और धन की चोटी पर बैठे व्यक्ति के नीचे न जाने कितनी आहें होती हैं, कितने नरमुंड होते हैं, कितनी चालबाजियाँ होती हैं.... राजनीति शायद इसी का नाम है...]

आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं (भाग-३)

Do You Know Sonia Gandhi? (Part-3)
(इस भाग में – सोनिया गाँधी का जन्म, उनका पारिवारिक इतिहास, उनके सम्बन्ध, उनके झूठ, उनके द्वारा कानून से खिलवाड़ आदि शामिल हैं)
सोनिया गाँधी से सम्बन्धित पिछले दोनों अनुवादों में हमने सोनिया गाँधी के बारे में काफ़ी कुछ जाना (क्या वाकई?) लेकिन जितना जाना उतने ही प्रश्न दिमागों में उठते गये। उन दोनो पोस्टों पर मुझे ब्लॉग पर और व्यक्तिगत रूप से कई अच्छे-बुरे मेल प्राप्त हुए, जिसका जिक्र मैंने तीसरी पोस्ट “सोनिया गाँधी की पोस्ट पर उठते सवाल-जवाब” में किया था। और जैसा कि मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूँ, कि मेरी सोनिया गाँधी से कोई व्यक्तिगत रंजिश नहीं है और ना ही मुझे इस बात का कोई मुगालता है कि मैं कोई बहुत बड़ा “शोधक” हूँ, फ़िर भी सोनिया भक्तों (इसे कॉंग्रेस भक्तों भी पढ़ा जा सकता है) ने ईमेल-हमले लगातार जारी रखे। मैं उनसे सिर्फ़ एक-दो सवाल पूछना चाहता था (लेकिन Anonymous मेल होने के कारण पूछ ना सका), कि इतना हल्ला मचाने वाले ये लोग जानते हैं कि सोनिया गाँधी का जन्म कहाँ हुआ? उनकी शिक्षा-दीक्षा कहाँ और कितनी हुई? उनकी पृष्ठभूमि क्या है? वे किस परिवार से हैं? इसलिये डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखित इस लेख का अनुवाद “सोनिया गाँधी, भाग-३” के रूप में पेश करना मैं अपना कर्तव्य मानता हूँ (क्योंकि कई लोगों ने मुझे ईमेल से जवाब देने का मौका नहीं दिया)। बहरहाल, पेश है डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखित एक विस्तृत लेख का हिन्दी अनुवाद, जिसमें इनमें से कई प्रश्नों के जवाब मिलते हैं (और आज तक न तो सोनिया गाँधी द्वारा अथवा कॉंग्रेस भक्तों द्वारा डॉ. स्वामी पर कोई “मानहानि” (!) का मुकदमा दायर किया गया है) –

“मेरा (मतलब डॉ.स्वामी का) सोनिया गाँधी का विरोध सिर्फ़ इसी बात को लेकर नहीं है कि उनका जन्म इटली में हुआ है, क्योंकि यह कोई मुद्दा नहीं है, बल्कि इटली सहित किसी और देश में विदेशी मूल की बात का फ़ैसला वहाँ के न्यायालयों ने किया हुआ है, कि सर्वोच्च और महत्वपूर्ण पदों पर विदेशी मूल का व्यक्ति नहीं पदासीन हो सकता, लेकिन भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है। 17 मई 2004 को 12.45 पर राष्ट्रपति ने मुझे मिलने का समय दिया था, उसी समय मैंने उनसे कहा था कि यदि सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री बनती हैं तो मैं इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दूँगा, और “रजिस्ट्रेशन” द्वारा नागरिकता हासिल किये जाने के कारण उसे रद्द किया भी जा सकता है।

भारतीय नागरिकों को सोनिया की पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी हासिल करना बेहद मुश्किल बात है, क्योंकि इटली के जन्म के कारण और वहाँ की भाषाई समस्याओं के कारण किसी पत्रकार के लिये भी यह मुश्किल ही है (भारत में पैदा हुए नेताओं की पृष्ठभूमि के बारे में हम कितना जानते हैं?) लेकिन नागरिकों को जानने का अधिकार तो है ही। सोनिया के बारे में तमाम जानकारी उन्हीं के द्वारा अथवा काँग्रेस के विभिन्न मुखपत्रों में जारी की हुई सामग्री पर आधारित है, जिसमें तीन झूठ साफ़ तौर पर पकड़ में आते हैं।

पहला झूठ – सोनिया गाँधी का असली नाम “सोनिया” नहीं बल्कि “ऎंटोनिया” है, यह बात इटली के राजदूत ने 27 अप्रैल 1983 को लिखे पत्र में स्वीकार की है, यह पत्र गृह मंत्रालय नें अपनी मर्जी से कभी सार्वजनिक नहीं किया। “एंटॊनिया” नाम सोनिया गाँधी के जन्म प्रमाणपत्र में अंकित है। सोनिया गाँधी को “सोनिया” नाम उनके पिता स्व.स्टेफ़ानो माईनो ने दिया था। स्टीफ़ानो माइनो द्वितीय विश्व युद्ध के वक्त रूस में युद्ध बन्दी थे। स्टीफ़ानो ने एक कार्यकर्ता के तौर पर “नाजी” सेना में काम किया था, जैसा कि कई इटालियन फ़ासिस्टों ने किया था। “सोनिया” एक रूसी नाम है न कि इटालियन। रूस में बिताये जेल के लम्हों में सोनिया के पिता धीरे-धीरे रूस समर्थक बन गये थे, खासकर तब जबकि उन समेत इटली के सभी “फ़ासिस्टों” की सम्पत्ति अमेरिकी सेनाओं द्वारा नष्ट या जब्त कर ली गई थी।

दूसरा झूठ – उनका जन्म इटली के लूसियाना में हुआ, ना कि जैसा उन्होंने संसद में दिये अपने शपथ पत्र में उल्लेख किया है कि “उनका जन्म ओरबेस्सानो में हुआ”। शायद वे अपना जन्म स्थान “लूसियाना” छुपाना चाहती हैं, क्योंकि इससे उनके पिता के नाजियों और मुसोलिनी से सम्बन्ध उजागर होते हैं, जबकि उनका परिवार लगातार नाजियों और फ़ासिस्टों के सम्पर्क में रहा, युद्ध समाप्ति के पश्चात भी। लूसियाना नाजियों के नेटवर्क का मुख्य केन्द्र था और यह इटली-स्विस सीमा पर स्थित है। इस झूठ का कोई औचित्य नजर नहीं आता और ना ही आज तक उनकी तरफ़ से इसका कोई स्पष्टीकरण दिया गया है।

तीसरा झूठ – सोनिया गाँधी का आधिकारिक शिक्षण हाई स्कूल से अधिक नहीं हुआ है। लेकिन उन्होंने रायबरेली के 2004 लोकसभा चुनाव में एक शपथ पत्र में कहा है कि उन्होंने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में डिप्लोमा किया हुआ है। यही झूठ बात उन्होंने सन 1999 में लोकसभा में अपने परिचय पत्र में कही थी, जो कि लोकसभा द्वारा “हू इज़ हू” के नाम से प्रकाशित की जाती है। बाद में जब मैंने लोकसभा के स्पीकर को लिखित शिकायत की, कि यह घोर अनैतिकता भरा कदम है, तब उन्होंने स्वीकार किया कि ऐसा “टाईपिंग” की गलती की वजह से हुआ (ऐसा “टायपिंग मिस्टेक” तो गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड़्स में शामिल होने लायक है)। सच्चाई तो यह है कि सोनिया ने कॉलेज का मुँह तक नहीं देखा है। वे जिआवेनो स्थित एक कैथोलिक स्कूल जिसका नाम “मारिया ऑसिलियाट्रिस” में पढने जाती थीं (यह स्कूल उनके तथाकथित जन्म स्थान ओरबेस्सानो से 15 किमी दूर स्थित है)। गरीबी के कारण बहुत सी इटालियन लड़कियाँ उन दिनों ऐसी मिशनरी में पढने जाया करती थीं, और उनमें से बहुतों को अमेरिका में सफ़ाई कर्मचारी, वेटर आदि के कामों की नौकरी मिल जाती थी। उन दिनों माइनो परिवार बहुत गरीब हो गया था। सोनिया के पिता एक मेसन और माँ एक खेतिहर मजदूर के रूप में काम करती थीं (अब इस परिवार की सम्पत्ति करोड़ों की हो गई है!)। फ़िर सोनिया इंग्लैंड स्थित केम्ब्रिज कस्बे के “लेन्नॉक्स स्कूल” में अंग्रेजी पढने गईं, ताकि उन्हें थोड़ा सम्मानजनक काम मिल जाये। यह है उनका कुल “शिक्षण”, लेकिन भारतीय समाज को बेवकूफ़ बनाने के लिये उन्होंने संसद में झूठा बयान दिया (जो कि नैतिकता का उल्लंघन भी है) और चुनाव में झूठा शपथ पत्र भी, जो कि भारतीय दंड संहिता के अनुसार अपराध भी है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार प्रत्याशी को उसकी सम्पत्ति और शिक्षा के बारे में सही-सही जानकारी देना आवश्यक है। इन तीन झूठों से साबित होता है कि सोनिया गाँधी कुछ “छिपाना” चाहती हैं, या उनका कोई छुपा हुआ कार्यक्रम है जो किसी और मकसद से है, जाहिर है कि उनके बारे में और जानकारी जुटाना आवश्यक है।

कुमारी सोनिया गाँधी अच्छी अंग्रेजी से अवगत होने के लिये केम्ब्रिज कस्बे के वार्सिटी रेस्टोरेंट में काम करने लगीं, वहीं उनकी मुलाकात 1965 में राजीव गाँधी से पहली बार हुई। राजीव उस यूनिवर्सिटी में छात्र थे और पढ़ाई मे कुछ खास नहीं थे, इसलिये राजीव 1966 में लन्दन चले गये जहाँ उन्होंने इम्पीरियल इंजीनियरिंग कॉलेज में थोड़ी शिक्षा ग्रहण की। सोनिया भी लन्दन चली गईं जहाँ उन्हें एक पाकिस्तानी सलमान थसीर के यहाँ नौकरी मिल गई। सलमान थसीर साहब का अधिकतर बिजनेस दुबई से संचालित होता था, लेकिन वे अधिकतर समय लन्दन में ही डटे रहते थे। इस नौकरी में सोनिया गाँधी ने अच्छा पैसा कमाया, कम से कम इतना तो कमाया ही कि वे राजीव गाँधी की आर्थिक मदद कर सकें, जिनके “खर्चे” बढते ही जा रहे थे (इन्दिरा गाँधी भी उनके उन खर्चों से काफ़ी नाराज थीं और ऐसा उन्होंने खुद मुझे बताया था जब मेरी मुलाकात ब्रांडेस विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में उनसे हुई थी और उस वक्त मैं हार्वर्ड में वाणिज्य का प्रोफ़ेसर लगा ही था)। संजय गाँधी को लिखे राजीव गाँधी के पत्रों से यह स्पष्ट था कि राजीव, सोनिया के आर्थिक कर्जे में फ़ँसे हुए थे और राजीव ने संजय से मदद की गुहार की थी, क्योंकि संजय उनके कर्जों को निपटाने में सक्षम(?) थे। उस दौरान राजीव अकेले सोनिया गाँधी के मित्र नहीं थे, माधवराव सिंधिया और एक जर्मन स्टीगलर उनके अंतरंग मित्रों में से एक थे। माधवराव से उनकी दोस्ती राजीव से शादी के बाद भी जारी रही।

बहुत कम लोगों को यह पता है कि 1982 में एक रात को दो बजे माधवराव की कार का एक्सीडेंट आईआईटी दिल्ली के गेट के सामने हुआ था, और उस समय कार में दूसरी सवारी थीं सोनिया गाँधी। दोनों को बहुत चोटें आई थीं, आईआईटी के एक छात्र ने उनकी मदद की, कार से बाहर निकाला, एक ऑटो रिक्शा में सोनिया को इंदिरा गाँधी के यहाँ भेजा गया, क्योंकि अस्पताल ले जाने पर कई तरह से प्रश्न हो सकते थे, जबकि माधवराव सिन्धिया अपनी टूटी टाँग लिये बाद में अकेले अस्पताल गये। जब परिदृश्य से सोनिया पूरी तरह गायब हो गईं तब दिल्ली पुलिस ने अपनी भूमिका शुरु की। बाद के वर्षों में माधवराव सिंधिया सोनिया के आलोचक बन गये थे और मित्रों के बीच उनके बारे में “कई बातें” करने लगे थे। यह बड़े आश्चर्य और शर्म की बात है कि 2001 में माधवराव की मृत्यु और उनके विमान दुर्घटना की कोई गहन जाँच नहीं हुई, जबकि उसी विमान से मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित भी जाने वाले थे और उन्हें आखिरी समय पर सिंधिया के साथ न जाने की सलाह दी गई थी।

राजीव गाँधी और सोनिया का विवाह ओर्बेस्सानो में एक चर्च में हुआ था, हालांकि यह उनका व्यक्तिगत लेकिन विवादास्पद मामला है और जनता को इससे कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन जनता का जिस बात से सरोकार है वह है इन्दिरा गाँधी द्वारा उनका वैदिक रीति से पुनः विवाह करवाना, ताकि भारत की भोली जनता को बहलाया जा सके, और यह सब हुआ था एक सोवियत प्रेमी अधिकारी टी.एन.कौल की सलाह पर, जिन्होंने यह कहकर इन्दिरा गाँधी को इस बात के लिये मनाया कि “सोवियत संघ के साथ रिश्तों को मजबूत करने के लिये यह जरूरी है”, अब प्रश्न उठता है कि कौल को ऐसा कहने के लिये किसने उकसाया?

जब भारतीय प्रधानमंत्री का बेटा लन्दन में एक लड़की से प्रेम करने में लगा हो, तो भला रूसी खुफ़िया एजेंसी “केजीबी” भला चुप कैसे रह सकती थी, जबकि भारत-सोवियत रिश्ते बहुत मधुर हों, और सोनिया उस स्टीफ़ानो की पुत्री हों जो कि सोवियत भक्त बन चुका हो। इसलिये सोनिया का राजीव से विवाह भारत-सोवियत सम्बन्धों और केजीबी के हित में ही था। राजीव से शादी के बाद माइनो परिवार के सोवियत संघ से सम्बन्ध और भी मजबूत हुए और कई सौदों में उन्हें दलाली की रकम अदा की गई । डॉ.येवेग्निया अल्बाट्स (पीएच.डी. हार्वर्ड) एक ख्यात रूसी लेखिका और पत्रकार हैं, वे बोरिस येल्तसिन द्वारा सन 1991 में गठित एक आयोग की सदस्या थीं, ने अपनी पुस्तक “द स्टेट विदिन अ स्टेट : द केजीबी इन सोवियत यूनियन” में कई दस्तावेजों का उल्लेख किया है, और इन दस्तावेजों को भारत सरकार जब चाहे एक आवेदन देकर देख सकती है। रूसी सरकार ने सन 1992 में डॉ. अल्बाट्स के इन रहस्योद्घाटनों को स्वीकार किया, जो कि “हिन्दू” में 1992 में प्रकाशित हो चुका है । उस प्रवक्ता ने यह भी कहा कि “सोवियत आदर्शों और सिद्धांतों को बढावा देने के लिये” इस प्रकार का पैसा माइनो और कांग्रेस प्रत्याशियों को चुनावों के दौरान दिया जाता रहा है । 1991 में रूस के विघटन के पश्चात जब रूस आर्थिक भंवर में फ़ँस गया तब सोनिया गाँधी का पैसे का यह स्रोत सूख गया और सोनिया ने रूस से मुँह मोड़ना शुरु कर दिया। मनमोहन सिंह के सत्ता में आते ही रूस के वर्तमान राष्ट्रपति पुतिन (जो कि घुटे हुए केजीबी जासूस रह चुके हैं) ने तत्काल दिल्ली में राजदूत के तौर पर अपना एक खास आदमी नियुक्त किया जो सोनिया के इतिहास और उनके परिवार के रूसी सम्बन्धों के बारे में सब कुछ जानता था। अब फ़िलहाल जो सरकार है वह सोनिया ही चला रही हैं यह बात जब भारत में ही सब जानते हैं तो विदेशी जासूस कोई मूर्ख तो नहीं हैं, इसलिये उस राजदूत के जरिये भारत-रूस सम्बन्ध अब एक नये दौर में प्रवेश कर चुके हैं। हम भारतवासी रूस से प्रगाढ़ मैत्री चाहते हैं, रूस ने जब-तब हमारी मदद भी की है, लेकिन क्या सिर्फ़ इसीलिये हमें उन लोगों को स्वीकार कर लेना चाहिये जो रूसी खुफ़िया एजेंसी से जुड़े रहे हों? अमेरिका में भी किसी अधिकारी को इसराइल के लिये जासूसी करते हुए बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, भले ही अमेरिका के इसराइल से कितने ही मधुर सम्बन्ध हों। सम्बन्ध अपनी जगह हैं और राष्ट्रहित अलग बात है। दिसम्बर 2001 में मैने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर करके सभी दस्तावेज प्रस्तुत कर, केजीबी और सोनिया के सम्बन्धों की सीबीआई द्वारा जाँच की माँग की थी, जिसे वाजपेयी सरकार द्वारा ठुकरा दिया गया। इससे पहले तत्कालीन राज्य मंत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया ने 3 मार्च 2001 को इस केस की सीबीआई जाँच के आदेश दे दिये थे, लेकिन कांग्रेसियों द्वारा इस मुद्दे पर संसद में हल्ला-गुल्ला करने और कार्रवाई ठप करने के कारण वाजपेयी ने वसुन्धरा का वह आदेश खारिज कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने मई 2002 में सीबीआई को रूसी सम्बन्धों के बारे में जाँच करने के आदेश दिये। सीबीआई ने दो वर्ष तक “जाँच” (?) करने के बाद “बिना एफ़आईआर दर्ज किये” कोर्ट को यह बताया कि सोनिया और रूसियों में कोई सम्बन्ध नहीं है, लेकिन सीबीआई को FIR दर्ज करने से किसने रोका, वाजपेयी सरकार ने, क्यों? यह आज तक रहस्य ही है। इस केस की अगली सुनवाई होने वाली है, लेकिन अब सोनिया “निर्देशक” की भूमिका में आ चुकी हैं और सीबीआई से किसी स्वतन्त्र कार्य की उम्मीद करना बेकार है।
............ जारी ..... है (भाग-४ शीघ्र ही), जिसमें हम पायेंगे कई अनसुलझे और बेचैन करने वाले प्रश्न.... तब तक प्रिय आलोचकों, "मेरा मेल बॉक्स खुला है खुला ही रहेगा, तुम्हारे लिये..."

Sonia Gandhi, Italy, Questions about Sonia, Sonia's Truth, सोनिया गाँधी, इटली