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बुधवार, 31 जुलाई 2013

ऊधम सिंह

ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 में पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम गाँव में हुआ। ऊधमसिंह की माता और पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। उनके जन्म के दो साल बाद 1901 में उनकी माँ का निधन हो गया और 1907 में उनके पिता भी चल बसे। ऊधमसिंह और उनके बड़े भाई मुक्तासिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। 1917 में उनके भाई का भी निधन हो गया। इस प्रकार दुनिया के ज़ुल्मों सितम सहने के लिए ऊधमसिंह बिल्कुल अकेले रह गए।

शहीद ऊधम सिंह का ऐतिहासिक बयान

जलिया वाले बाग के नरसंहार से भारतीय क्रांतिकारियों में बहुत आक्रोश उठा था और खून का बदला खून से लेने के लिए वह बेचैन हो गये थे। ऊधम सिंह ने इस नरसंहार का बदला लिया। 3 मार्च 1940 को लंदन के रायल सेन्ट्रल एशियन हाल में आयोजित अफगानिस्तान के संबंध में एक परिसवाद में भाग लेने के लिए यह दोनों लोग (ऊधण सिंह और सर माईकल औ डायर) उपस्थित थे। ऊधम सिंह श्रोता के रूप में जेब में पिस्तौल लेकर सभा में जा पहुंचे। वहां जैसे ही डायर भाषण समाप्त कर अपनी कुर्सी की ओर मुड़ा ऊधम सिंह एकदम खड़े हो गये और पिस्तौल निकालकर सर माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दी। डायर वहीं पर ढेर हो गया और सभा में सन्नाटा छा गया। ऊधम सिंह यह कार्य कर भागे नहीं उनको पकड़ लिया गया तथा 2 अप्रैल 1940 को अदालत में पेश किया गया।
उन्होंने न्यायाधीश के सामने बयान देते हुए कहा- मैंने यह हत्या इसलिए की है कि मुझे इस दरिंदे से नफरत थी। उसे जो सजा मिली है वह उसी के काबिल था। वह सच्चे अर्थों में एक अपराधी था। वह मेरे वतन के लोगों की आत्मा की हत्या करना चाहता था। इसलिए मैंने उसकी हत्या कर दी है। अगर आप सच माने तो मैं पूरे 20 वर्षों से बदला लेने के लिये यहां घूम रहा था। मुझे खुशी है कि मैंने अपनी काम पूरा कर लिया है। मैं मौत से नहीं डरता। मैं जवान मौत मरना चाहता हूं। बूढ़ा होकर या अपाहिज होकर मरने का क्या लाभ? मैं अपने देश की जनता के लिए अपने प्राण त्याग रहा हूं देश के लिए प्राण उत्सर्ग कर रहा हूं। क्या लार्ड जेटलैंड भी मर गये हैं। उनको जरूर मारना चाहिए। मैंने अपनी आंखों से देखा है कि अंग्रेजी हुकूमत से भारत की जनता दुखी है, भूख से मर रही है। मैं इसके विरोध में अपनी यह प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा हूं। यह मेरार् कत्तव्य है। इससे ज्यादा सम्मान मुझे क्या दिया जा सकता है कि अपनी प्यारी मातृभूमि के लिए मैं मृत्यु को वरण करूं। जब न्यायाधीश ने उनका नाम पूछा तो ऊधम सिंह ने जवाब दिय। मेरा नाम ऊधम सिंह नहीं है। मेरा नाम राम मुहम्मद सिंह आजाद हैं। उन्होंने राम शब्द का प्रयोग हिन्दुओं के लिए, मोहम्मद शब्द का प्रयोग मुसलमानों के लिए, सिंह का प्रयोग सिखों के लिए और आजाद शब्द का प्रयोग अपने देश की आजादी के लिए किया था। जब ऊधम सिंह लंदन जेल में थे उस समय जब कोई कैदी उन्हें नाम से बुलाता था तो उन पर इसकी तुरंत प्रतिक्रिया होती थी।
जेल से लिखे हुए अपने एक पत्र में उन्होंने कहा था, ‘मैं कैदी नहीं हूं, मैं तो इंग्लैंड की महारानी का सरकारी मेहमान हूं। ऊधम सिंह ने डायर को मारा, कबूल किया उनको फांसी की सजा सुनवाई गयी। अंत में उन्हें 31 जुलाई 1940 को फांसी दे दी गयी। एक क्रांतिकारी का अंत हो गया पर भारतीय आज भी उन्हें बड़ी इज्जत से याद करते हैं।
Photo: ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 में पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम गाँव में हुआ। ऊधमसिंह की माता और पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। उनके जन्म के दो साल बाद 1901 में उनकी माँ का निधन हो गया और 1907 में उनके पिता भी चल बसे। ऊधमसिंह और उनके बड़े भाई मुक्तासिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। 1917 में उनके भाई का भी निधन हो गया। इस प्रकार दुनिया के ज़ुल्मों सितम सहने के लिए ऊधमसिंह बिल्कुल अकेले रह गए।

शहीद ऊधम सिंह का ऐतिहासिक बयान

जलिया वाले बाग के नरसंहार से भारतीय क्रांतिकारियों में बहुत आक्रोश उठा था और खून का बदला खून से लेने के लिए वह बेचैन हो गये थे। ऊधम सिंह ने इस नरसंहार का बदला लिया। 3 मार्च 1940 को लंदन के रायल सेन्ट्रल एशियन हाल में आयोजित अफगानिस्तान के संबंध में एक परिसवाद में भाग लेने के लिए यह दोनों लोग (ऊधण सिंह और सर माईकल औ डायर) उपस्थित थे। ऊधम सिंह श्रोता के रूप में जेब में पिस्तौल लेकर सभा में जा पहुंचे। वहां जैसे ही डायर भाषण समाप्त कर अपनी कुर्सी की ओर मुड़ा ऊधम सिंह एकदम खड़े हो गये और पिस्तौल निकालकर सर माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दी। डायर वहीं पर ढेर हो गया और सभा में सन्नाटा छा गया। ऊधम सिंह यह कार्य कर भागे नहीं उनको पकड़ लिया गया तथा 2 अप्रैल 1940 को अदालत में पेश किया गया।
उन्होंने न्यायाधीश के सामने बयान देते हुए कहा- मैंने यह हत्या इसलिए की है कि मुझे इस दरिंदे से नफरत थी। उसे जो सजा मिली है वह उसी के काबिल था। वह सच्चे अर्थों में एक अपराधी था। वह मेरे वतन के लोगों की आत्मा की हत्या करना चाहता था। इसलिए मैंने उसकी हत्या कर दी है। अगर आप सच माने तो मैं पूरे 20 वर्षों से बदला लेने के लिये यहां घूम रहा था। मुझे खुशी है कि मैंने अपनी काम पूरा कर लिया है। मैं मौत से नहीं डरता। मैं जवान मौत मरना चाहता हूं। बूढ़ा होकर या अपाहिज होकर मरने का क्या लाभ? मैं अपने देश की जनता के लिए अपने प्राण त्याग रहा हूं देश के लिए प्राण उत्सर्ग कर रहा हूं। क्या लार्ड जेटलैंड भी मर गये हैं। उनको जरूर मारना चाहिए। मैंने अपनी आंखों से देखा है कि अंग्रेजी हुकूमत से भारत की जनता दुखी है, भूख से मर रही है। मैं इसके विरोध में अपनी यह प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा हूं। यह मेरार् कत्तव्य है। इससे ज्यादा सम्मान मुझे क्या दिया जा सकता है कि अपनी प्यारी मातृभूमि के लिए मैं मृत्यु को वरण करूं। जब न्यायाधीश ने उनका नाम पूछा तो ऊधम सिंह ने जवाब दिय। मेरा नाम ऊधम सिंह नहीं है। मेरा नाम राम मुहम्मद सिंह आजाद हैं। उन्होंने राम शब्द का प्रयोग हिन्दुओं के लिए, मोहम्मद शब्द का प्रयोग मुसलमानों के लिए, सिंह का प्रयोग सिखों के लिए और आजाद शब्द का प्रयोग अपने देश की आजादी के लिए किया था। जब ऊधम सिंह लंदन जेल में थे उस समय जब कोई कैदी उन्हें नाम से बुलाता था तो उन पर इसकी तुरंत प्रतिक्रिया होती थी।
जेल से लिखे हुए अपने एक पत्र में उन्होंने कहा था, ‘मैं कैदी नहीं हूं, मैं तो इंग्लैंड की महारानी का सरकारी मेहमान हूं। ऊधम सिंह ने डायर को मारा, कबूल किया उनको फांसी की सजा सुनवाई गयी। अंत में उन्हें 31 जुलाई 1940 को फांसी दे दी गयी। एक क्रांतिकारी का अंत हो गया पर भारतीय आज भी उन्हें बड़ी इज्जत से याद करते हैं।

शनिवार, 6 जुलाई 2013

हिन्दू नक्षत्र निरीक्षण केंद्र

क्या आप जानते हैं कि.... आजकल दिल्ली में हम जिसे कुतुबमीनार कहते हैं ...और .... उसे लूले कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाया गया समझते हैं.... दरअसल वह...... महाराजा विक्रमादित्य के राज्यकाल में.... राजा विक्रमादित्य द्वारा बनवाया गया .... ""हिन्दू नक्षत्र निरीक्षण केंद्र"" है..... जिसका ""असली नाम ध्रुव स्तम्भ"" है...!

परन्तु ... प्राचीन इतिहासकारों द्वारा मूर्खतावश.... और, आधुनिक काल में ""मुस्लिम तुष्टिकरण हेतु"" .... कुतुबमीनार को .... उस लूले कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाया गया.... कहा जाता है.....!

प्राचीन इतिहासकारों द्वारा .... बिना तथ्यों की जानकारी जुटाए ही .... कतिपय नामों की समानता के कारण ... ऐसा मान लिया गया कि..... कुतुबमीनार ... कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाया गया है...!

यह बहुत कुछ इसी प्रकार की मूर्खता है .... जैसे कि... कोई यह कहना शुरू कर दे कि..... आर्यभट्ट नामक उपग्रह .... आर्यभट्ट ने ही भेजा था.... अथवा .... सभी शहरों में मौजूद ... MG ROAD (महात्मा गाँधी रोड )... महात्मा गाँधी ने बनवाया था....!

जहाँ तक.... उस लूले गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक की बात है तो..... वो लुटेरा और जेहादी गोरी का गुलाम था.... और, वो गोरी के साथ ही भारत में जिहाद चलाने आया था..... जिसे बाद में भारत का प्रभारी बना कर ...स्थायी तौर पर भारत में जिहाद चलाने की अनुमति दे दी गयी थी..... जिस दौरान उसने .... भारत में सिर्फ लूट-पाट मचाई और.. मंदिरों को तोडा...!

हुआ दरअसल ये था कि.... जब वो लूला कुतुबुद्दीन .... जिहाद करते करते दिल्ली पहुंचा तो....... वहां इतना बड़ा और खुबसूरत स्तम्भ देखकर ..... उस लूले का मुंह खुला का खुला रह गया.... और, उसने अपने साथियों से पूछा कि .... ये क्या है...?????

इस पर.... उस लूले को अरबी में बताया गया ( क्योंकि, उस लूले को निपट मूर्ख होने के कारण हिंदी नहीं आती थी ) कि..... हुजुर ... ये ""क़ुतुब मीनार""" ... अर्थात , उत्तरी धुव का निरीक्षण केंद्र है ...!

बस यहीं से..... वो लूला और उसके उज्जड साथी इसे ... क़ुतुबमीनार- कुतुबमीनार कहने लगे .... !

उस पर भी ..... उस लूले कुतुबुद्दीन ऐबक ने ... ये बात खुद से कहीं भी नहीं कहा है कि..... कुतुबमीनार उसने बनवाया है..... लेकिन.... उसने ये जरुर कबूल किया है कि..... उसने इस स्तम्भ के चारों और बनी 27 मंदिरों को ध्वस्त कर दिया है !

लेकिन.... बाद के इतिहासकारों ने नामों में समानता देख कर .... बिना कुछ सोचे समझे ही ये नतीजा निकल लिया कि..... इस कुतुबमीनार को कुतुबुद्दीन ऐबक ने ही बनवाया होगा....!

अब अगर...... इतिहासकारों की बातों को छीलना शुरू किया जाए तो..... सबसे पहला प्रश्न यही है कि.....

अगर .... उस लूले कुतुबुद्दीन ने क़ुतुब मीनार बनाई..... तो कब ... क्योंकि.... कुतुबुद्दीन तो मात्र 4 साल ही भारत में जिहाद कर पाया था..... और...क्या कुतुबुद्दीन ने अपने निहायत ही छोटे राज्यकाल (1206 से 1210 ) में ... इतने बड़े मीनार का निर्माण करा सकता था .... जबकि पहले के दो वर्ष उसने लाहौर में विरोधियों को समाप्त करने में बिताये .....और, 1210 में भी मरने के पहले भी वह लाहौर में था ?????

फिर भी कुछ लोग अपनी थेथारोलोजी का इस्तेमाल करते हुए बोलते हैं कि.... लूले ने इसे 1193 AD में बनाना शुरू किया और कुतुबुद्दीन ने सिर्फ एक ही मंजिल बनायीं .. जबकि, उसके ऊपर के तीन मंजिलें उसके परवर्ती बादशाह इल्तुतमिश ने बनाई और ...... उसके ऊपर की शेष मंजिलें बाद में बनी....!

यदि उनकी ही बातों को माना जाए तो....अगर.... 1193 में कुतुबुद्दीन ने .....मीनार बनवाना शुरू किया होता तो ..... उसका नाम "बादशाह गोरी " के नाम पर.... "गोरी मीनार", या "गजनी मीनार " ऐसा ही कुछ होता ......... या कि ........ एक "लूले गुलाम कुतुबुद्दीन" के नाम पर .......क़ुतुब मीनार....????

अब कुछ लोगों ने ये भी कहना शुरू कर दिया है कि..... ऐबक ने नमाज़ समय अजान देने केलिए यह मीनार बनवाई थी...... तो क्या उतनी ऊंचाई से किसी की आवाज़ नीचे तक आ भी सकती है ?????
और फिर क्या.... बगल में ही मौजूद लौह स्तम्भ को ..... अजान के समय .... अल्लाह को बैठने के लिए बनाया गया था....??????

असल में.....सच तो यह है कि.... जिस स्थान में क़ुतुब परिसर है ....... उसे मेहरौली कहा जाता है,..... और यह मेहरौली ........वराहमिहिर के नाम पर बसाया गया था .....जो सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में एक और .. एक बहुत बड़े खगोलशास्त्री एवं भवन निर्माण विशेषज्ञ थे !

उन्होंने इस परिसर में मीनार यानि स्तम्भ के चारों ओर नक्षत्रों के अध्ययन के लिए........ 27 कलापूर्ण परिपथों का निर्माण करवाया था.... और, .इन परिपथों के स्तंभों पर सूक्ष्मकारीगरी के साथ देवी देवताओं की प्रतिमाएं भी उकेरी गयीं थीं जो नष्ट किये जाने के बाद भी कहीं कहीं दिख ही जाती हैं... ( चित्र संलग्न )

इसका दूसरा सबसे बड़ा प्रमाण..... उसी परिसर में खड़ा लौह स्तम्भ है........जिस पर खुदा हुआ ब्राम्ही भाषा का लेख.........जिसमे लिखा है कि..... यह स्तम्भ जिसे गरुड़ ध्वज कहा गया है... सम्राट चन्द्र गुप्त विक्रमादित्य (राज्य काल 380-414 ईसवीं ) द्वारा स्थापित किया गया था..... और, यह लौहस्तम्भ आज भी विज्ञान के लिए आश्चर्य की बात है ... क्योंकि... आज तक इसमें जंग नहीं लगा...
उसी महान सम्राट के दरबार में महान गणितज्ञ आर्य भट्ट.......खगोल शास्त्री एवं भवन निर्माण विशेषज्ञ वराह मिहिर......वैद्य राजब्रम्हगुप्त आदि हुए.......!

तो ये बहुत ही सामान्य ज्ञान कि बात है कि....ऐसे प्रतापी राजा के राज्य काल ....... जिसमे लौह स्तम्भ स्थापित हुआ ..........तो क्या जंगल में बिना कारण के सिर्फ अकेला स्तम्भ बना दिया गया होगा......??????

सोचो हिन्दुओं ...... आपके साथ क्या खेल खेला जा रहा है...... कि.... विध्वंसक को ही आपका निर्माता बना कर प्रस्तुत किया जा रहा है....!

क्या.... तुष्टिकरण का इस से भी ज्यादा घिनौना खेल ... दुनिया के किसी भाग में खेला जा सकता है....?????

जागो हिन्दुओं.... और, पहचानो अपने आपको ......

अन्यथा अभी तक तुम्हारा तो सिर्फ ऐतिहासिक धरोहर ही लूटा गया है..... .. कल तुम्हारे घर को लूटने की तैयारी है ....!