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गुरुवार, 20 जून 2013

सउदी अरब में हिन्दू सस्ता, घोड़ा महंगा -- मुजफ्फर हुसैन

क्या आप जानते हैं कि सउदी अरब में दुर्घटनावश यदि किसी मुस्लिम की मृत्यु हो जाती है तो उसके परिजनों को एक लाख रियाल का मुआवजा दिया जाता है। यदि मरने वाला ईसाई है तो 50,000 रियाल। लेकिन यदि मरने वाला कोई हिन्दू है तो उसके मुआवजे में केवल 6,666 रियाल दिए जाते हैं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि एक हिन्दू की कीमत मुस्लिम और ईसाई की तुलना में एक चौथाई से भी कम है। वहां अच्छा ऊंट 15 हजार रियाल में और अरबी घोड़ा 15 से 25 हजार रियाल में मिलता है। लेकिन एक हिन्दू की कीमत केवल 6,666 रियाल है। लेकिन एक मामला ऐसा भी है जिसमें हिन्दू की कीमत सबसे ऊंची है। वह है मतान्तरण की मंडी में होने वाली हिन्दू की खरीद-फरोख्त। यदि कोई हिन्दू मुसलमान बनने के लिए तैयार होता है तो उसे प्रारम्भ में ढाई लाख रियाल मिलेंगे और बाद में जो सुविधाएं मिलेंगी वे भी लाखों और करोड़ों में होंगी। सउदी सरकार से उसे यह पक्का आश्वासन मिल जाएगा कि नौकरी की अवधि समाप्त होने के बाद भी उसे उस देश से निकाला नहीं जाएगा। वह चाहेगा तो वहीं उसे दूसरी अच्छी नौकरी मिल जाएगी। सरकार की ओर से घर मिलेगा और उसके बच्चों को पढ़ाई-लिखाई तथा बीमारी की अवस्था में विशेष भत्ता। मुसलमान बन जाने पर ईसाई को एक लाख रियाल से भी कम मूल्य मिलेगा। इसका परिणाम यह हुआ है कि पिछले दस साल में 25 हजार हिन्दुओं को मतान्तरित करके मुस्लिम बना लिया गया है। यह आंकड़ा केवल भारत से गए हिन्दुओं का है। वर्षों से फिजी, मारीशस, बाली, मलेशिया और थाईलैण्ड में रहने वाले हिन्दुओं का सउदी अरब में जो मतान्तरण किया गया, वह आंकड़ा इसमें शामिल नहीं है। सउदी अरब सरकार के मजहबी मंत्रालय के एक प्रवक्ता का कहना है कि अब तक 75 हजार काफिरों को मुसलमान बनाया गया है। भारतीय हिन्दुओं को मुस्लिम बनाए जाने की क्रूर कहानी सउदी अरब में काम कर रहे भारतीय दूतावास को पूरी तरह से मालूम है। भारत का विदेश मंत्रालय 25 हजार हिन्दुओं को मुसलमान बना लिए जाने के तथ्य से अपरिचित हो, ऐसा नहीं लगता। मतान्तरित हो जाने का कारण केवल लालच ही नहीं, बल्कि हिन्दुओं पर लगातार होने वाले अत्याचार भी हैं।
1960-70 के दशक में जब खनिज तेल के धंधे में अरब देश मालामाल होने लगे तो रोजगार खोजने की दृष्टि से लाखों लोग मध्य एशिया में पहुंचने लगे। तेल परिशोधन संयंत्र में तकनीकीकर्मी से लेकर मामूली काम करने वालों की जरूरत थी। अरब भूखण्ड में एक तो आबादी बहुत कम थी, दूसरे जो भी लोग वहां थे उनका काम या तो ऊंट और बकरियों को चराना था या फिर अमीर अरबों के यहां गुलामी करनी थी। इसलिए न तो वे शिक्षित थे और न ही आधुनिक कामों से परिचित। जहां तक तेल उत्पादन और उससे जुड़ी तकनीक का सवाल था, उस काम में तो अमरीका और यूरोप के लोगों की भरमार हो गई। लेकिन भवन निर्माण, घरों और कार्यालयों में काम करने वाले लिपिक, लेखाकार, रसोइए और अन्य काम के लिए जिन गैर-प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता थी, उसके लिए भारतीय, पाकिस्तानी, बंगलादेशी और इसी तरह कुछ अफ्रीकी देशों के लोग वहां पहुंचने लगे।
सउदी अरब से लौटने वालों का कहना है कि वहां के नियम-कानून केवल मुस्लिमों के ही अनुकूल हैं। वहां जाकर कोई भी अपने पंथ का स्वतंत्रता से पालन नहीं कर सकता। यदि सउदी पुलिस को मालूम हो जाए कि अमुक घर में देवी-देवता की पूजा होती है तो उसे तुरंत बंदी बना लिया जाता है। महिलाएं सार्वजनिक स्थानों पर अपनी पारम्परिक वेष-भूषा में नहीं रह सकतीं। पुरुष के साथ महिलाएं बहुत कम दिखाई पड़ती हैं। रमजान में कोई अन्य मत-पंथी बाहर खा-पी नहीं सकता। सउदी सरकार वहाबी पंथी है जो इस्लाम में सबसे कट्टर माने जाते हैं। इसलिए उदार मुस्लिम जब उस वातावरण में ऊब जाता है तो फिर गैर-मुस्लिमों पर क्या गुजरती होगी, इसका अनुमान बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है। जब भी कोई हिन्दू स्वदेश लौटता है तो सउदी अरब के अपने जीवन की तुलना नरक से करता है।
इस मामले में सउदी अरब अकेला नहीं है। जब ईरान में इमाम खुमैनी का राज था उस समय उनके मन में एक ही उमंग थी कि सारी दुनिया हरे रंग से रंग जाए। उसे इस बात का खेद था कि एशिया में भारत उनके लिए सबसे बड़ा रोड़ा है। यदि दक्षिण-पूर्वी एशिया की ओर बढ़ना है तो पहले भारत का इस्लामीकरण करना होगा। उसके बाद ही चीन, जापान, कोरिया और वियतनाम का नम्बर आ सकता है। खुमैनी के युग में अनेक योजनाएं बनी थीं, जिनके अंतर्गत भारत में मतान्तरण का चक्कर चलाना और मुस्लिमों की आबादी में वृद्धि करना शामिल था। पिछले दिनों जब पोप भारत में आए थे तब उनको भी इस बात का दु:ख था कि 20वीं शताब्दी में वे भारत का ईसाईकरण नहीं कर सके। पोप ने चर्च में कार्यरत अपने कार्डीनल और अन्य अधिकारियों को लताड़ते हुए इस निष्क्रियता पर दु:ख व्यक्त किया था। पोप ने अंतत: फिर से एक विशेष अवधि तय करके चर्च को यह हिदायत दी है कि आने वाले 25 वर्ष में सम्पूर्ण भारत एक ईसाई देश हो जाना चाहिए। रोम और यूनान को जब वे ईसाईबहुल देश बना सकते हैं तो फिर भारत को क्यों नहीं? हिन्दुओं के प्रति एक योजनाबद्ध कार्यक्रम ईसाई और मुस्लिम देशों में चल रहा है। वे किसी भी कीमत पर भारत को हिन्दू देश नहीं रहने देना चाहते।
जहां कहीं मुस्लिम मतान्तरण का चक्र चलता है, वहां सउदी अरब सबसे आगे रहता है। वह मुस्लिम मिशनरी, जिसे तब्लीग कहा जाता है, उसमें सबसे अधिक पैसा खर्च करने वाला देश है। यानी सउदी अरब देश के भीतर और देश के बाहर- दोनों मोर्चों पर मतान्तरण के खेल में सक्रिय है। दुनिया के अनेक देशों में पेट्रो डालर का प्रवाह जारी करके सउदी अरब दुनिया के लोगों की आस्था का सौदा करता है। अब तो इस मामले में लंदन भी अग्रणी बन गया है। पिछले दिनों वहां का "रियाल खिलाफती मूवमेंट' नामक संगठन मतान्तरण के क्षेत्र में सबसे अधिक चर्चित रहा। धन-बल के आधार पर इस संगठन ने असंख्य लोगों को मतान्तरित किया है। अब इसकी शाखाएं अन्य देशों में भी शुरू हो गई हैं। भारत में महाराष्ट्र के कुछ नगरों में इसने अपने मुख्यालय शुरू किए हैं। ढाई लाख रुपए में किसी की भी आस्था और ईमान को खरीद लेना इनका धंधा बन गया है। भारत में मतान्तरण विरोधी कानून नहीं है, इसलिए उनको यहां खुली छूट मिल जाती है। भारत में गैर-मुस्लिम लड़कियों से विवाह करने के लिए प्रोत्साहित करना इस आन्दोलन में शामिल है। पिछले दिनों मुम्बई महानगर में तीन माह के भीतर 150 हिन्दू लड़कियों से विवाह करके उन्हें मुस्लिम बनाने की घटनाएं घटी हैं। इस प्रकार की घटनाएं पुलिस आंकड़ों में भी दर्ज हैं। लेकिन पुलिस चाहकर भी कुछ नहीं कर पाती, क्योंकि कानून ने उनके हाथ बांध रखे हैं। न्यायालय में "स्पेशल मेरिज एक्ट' के अंतर्गत होने वाले विवाह में केवल लड़की की आयु का प्रमाण-पत्र मांगा जाता है। बान्द्रा न्यायालय के बाहर झूठे निकाहनामा से लेकर साक्षी देने वाले तक उपलब्ध कराए जाते हैं। मात्र विवाह ही वे पर्याप्त नहीं समझते, बल्कि निकाह को भी अनिवार्य मानते हैं। निकाह तभी सम्भव है जब दोनों मुसलमान हों यानी लड़की को मतान्तरित किया जाता है। इस प्रकार मुस्लिम संख्या बढ़ जाने में वे समाधान मानते हैं। हर दिन इस प्रकार की घटनाएं घटती हैं। इसके लिए कोई प्रभावी कानून नहीं है। यदि कोई इसके लिए आवाज बुलंद करता है तो उसको साम्प्रदायिक कहकर चुप करा दिया जाता है। विदेशों में जिस हिन्दू का मतान्तरण कर दिया जाता है उसके पारपत्र में फिर किस तरह परिवर्तन किया जाता है, यह एक रहस्य की बात है। मतान्तरित व्यक्ति या तो अपने पुराने नाम वाले पारपत्र के आधार पर ही स्वदेश लौटता है या फिर कोई रहस्यमयी चक्कर चलाकर अपने मुस्लिम नाम का पारपत्र बना लेता है। यह सब कैसे होता है? यह खोज का विषय है।
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