शिवलिंग (Shiva Lingam) :
वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्स/धुरी (Axis) ही लिंग है।
The Whole Universe Rotates Through a Shaft Called Shiva Lingam.
हम जानते है की सभी भाषाओँ में एक ही शब्द के कई अर्थ निकलते है
जैसे: सूत्र के - डोरी/धागा, गणितीय सूत्र, कोई भाष्य, लेखन को भी सूत्र कहा जाता है जैसे नासदीय सूत्र, ब्रह्म सूत्र आदि |
अर्थ :- सम्पति, मतलब (मीनिंग), उसी प्रकार यहाँ लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है।
लिंग संस्कृत का शब्द है जिसके निम्न अर्थ है
त आकाशे न विधन्ते -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० ५ रूप ,रस ,गंध और स्पर्श :- ये लक्षण आकाश में नही है।
किन्तु शब्द ही आकाश का गुण है। "निष्क्रमणम् प्रवेशनमित्याकशस्य" लिंगम् -वै०। अ ० २ । आ ० १ ।सू ० २ ० जिसमे प्रवेश करना व निकलना होता है वह आकाश का लिंग है । अर्थात ये आकाश के गुण है।
"अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं क्षिप्रमिति काललिङ्गानि" ।-वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० ६
जिसमे अपर, पर, (युगपत) एक वर, (चिरम) विलम्ब , क्षिप्रम शीघ्र इत्यादि प्रयोग होते है , इसको काल कहते है , अर्थात ये काल के लिंग है।
इत इदमिति यतस्यद्दिश्यं लिंगम। - वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० १ ०
जिसमे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण , ऊपर व् निचेका व्यवहार होता है उसी को दिशा कहते है अर्थात ये सभी दिशा के लिंग है।
"इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञान ान्यात्मनोलिंगमिति" -न्याय० अ ० १ । आ ० १ । सू ० १ ०
जिसमे (इच्छा) राग , (द्वेष) वैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ , सुख, दुःख, (ज्ञान) जानना आदि गुण हो , वः जीवात्मा हैये सभी जीवात्मा के लिंग अर्थात कर्म व् गुण है ।
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शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है।
स्कन्दपुराण में कहा गया है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा गया है तथा कई अन्य नामोँ से भी संबोधित किया गया है जैसे : प्रकाश स्तंभ / लिंग, अग्नि स्तंभ / लिंग, उर्जा स्तंभ / लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ / लिंग (Cosmic Pillar/Lingam)
ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और पदार्थ | हमारा शरीर पदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है|
इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते है |
ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा ऊर्जा शिवलिंग में निहित है. वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है. (The Universe is a Sign of Shiva Lingam.)
शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-अनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक भी है,
अर्थात् इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों समान हैँ।
अब जरा आईसटीन का सूत्र देखिये जिस के आधार पर परमाणु बम बनाया गया, परमाणु के अन्दर छिपी अनंत ऊर्जा की एक झलक दिखाई जो कितनी विध्वंसक थी सब जानते है। (E=mc2) {ई=एम सी स्क्वेयर} [एनर्जी और मैटर एक ही हैँ] (डिस्कवरी साइंस चैनल पर आने वाले क्रार्यक्रम "डार्क मैटर्स- ट्विस्टेड बट ट्रू" का "आइंसटीन रिवेँज" नामक एपिसोड इंटरनेट पर डाउनलोड करके देखेँ।)
इसके अनुसार पदार्थ को पूर्णतयः ऊर्जा में बदला जा सकता है। अर्थात् ये दो नहीँ एक ही हैँ, पर वो दो हो कर सृष्टि का निर्माण करते हैँ।
हमारे ऋषियो ने ये रहस्य सहस्त्रोँ साल पहले ही ख़ोज लिया था।
हमारे संतों/ऋषियों ने जो हमें वेदों और उपनिषदों का ज्ञान लिखित रूप में प्रदान किया है, उन्होंने कभी यह दावा नहीं किया कि यह उनका काम है। वे हर काम के अंत में स्वीकार किया कि वे हमें बता रहे हैं जो उन्हें अपने पूर्वजों द्वारा कहा गया है. यह सार्वभौमिक ज्ञान लगभग १३.७ खरब वर्ष पुराना हमें संस्कृत जैसी महान भाषाओँ में उपलब्ध होता है। यह किसी अन्य भाषा में पूर्णतया अनुवाद नही किया जा सकता । कम से कम अंग्रेजी जैसी कमजोर भाषा में तो बिलकुल नहीँ।
जैसे एक छोटा सा उदाहरण देता हूँ:-
आज गूगल ट्रांसलेटर http://translate.google.com/ में लगभग सभी भाषाओँ का समावेश है किन्तु संस्कृत का नहीँ, क्योकि संस्कृत का व्याकरण विशाल तथा दुर्लभ है।
आप कहेंगे कि संस्कृत इतनी इम्पोर्टेन्ट नहीँ इसलिए नही होगी, यदि इम्पोर्टेन्ट नहीँ तो नासा संस्कृत क्यों अपनाना चाहती है। और अपने नवयुवकों को संस्कृत सीखने पर जोर क्योँ दे रही है? (मेरी एरिया 51 वाली पोस्ट देखेँ)
ये लिँक खोलिए : http://hindi.ibtl.in/news/ international/1978/article.ibtl
श्री वार्ताक जी (वेद विज्ञान मंडल,पुणे) ने अपने लेख Shiva Lingam – A Symbol of Science में लिखा है की - जब कालांतर में ज्ञान के स्तर में गिरावट आई तब पाश्चात्य वैज्ञानिको ने वेदों/उपनिषदों तथा पुराणो आदि को समझने में मूर्खता की क्योकि उनकी बुद्धिमत्ता वेदों में निहित प्रकाश से साक्षात्कार करने योग्य नही थी।
ऐसा उदहारण हम हमारे दैनिक जीवन में भी देखते है जैसे परीक्षा के दिनों में अध्ययन करते समय जब कोई टॉपिक हमें समझ न आये तो हम कह दिया करते है की ये टॉपिक तो बेकार है।
जब की असल में वह टॉपिक बेकार नही अपितु उस टॉपिक में निहित ज्ञान का प्रकाश हमारी बुद्धिमत्ता से अधिक है।
इसे इस तरह भी समझ सकते है की 12 वोल्ट धारण कर सकने वाले विद्युत बल्ब में अगर घरों में आने वाले वोल्ट (240) प्रवाहित कर दिया जाये तो उस बल्ब की क्या दुर्गति होगी? उसका फिलामेंट तत्क्षण अविलम्ब उड़ जायेगा।
कुछ महान (?) पाश्चात्य विद्वानोँ ने तो वेदोँ को काल्पनिक तक बता डाला
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हम अपने दैनिक जीवन में भी देख सकते है की जब भी किसी स्थान पर अकस्मात् उर्जा का उत्सर्जन होता है तो ऊर्जा का फैलाव अपने मूल स्थान के चारों ओर एक वृताकार पथ में तथा उपर व निचे की ओर अग्रसर होता है अर्थात दशोँ दिशाओं (आठों दिशों की प्रत्येक डिग्री (360 डिग्री) + ऊपर व नीचे ) होता है,
फलस्वरूप एक क्षणिक शिवलिंग आकृति की प्राप्ति होती है
जैसे बम विस्फोट से प्राप्त ऊर्जा का प्रतिरूप , शांत जल में कंकर फेंकने पर प्राप्त तरंग (ऊर्जा) का प्रतिरूप जैसा होता है आदि ।
सृष्टि के आरम्भ में महाविस्फोट के पश्चात् ऊर्जा का प्रवाह वृत्ताकार पथ में तथा ऊपर व नीचे की ओर हुआ फलस्वरूप एक महाशिवलिंग का प्राकट्य हुआ जैसा की आप उपर्युक्त चित्र में देख सकते है|
जिसका वर्णन हमें लिंगपुराण, शिवमहापुराण, स्कन्द पुराण आदि में मिलता है की आरम्भ में निर्मित शिवलिंग इतना विशाल (अनंत) तथा की देवता आदि मिल कर भी उस लिंग के आदि और अंत का छोर या शाश्वत अंत न पा सके।
पुराणोँ में कहा गया है की प्रत्येक महायुग के पश्चात समस्त संसार इसी शिवलिंग में समाहित (लय) होता है तथा इसी से पुनः सृजित होता है ।
[उसी आदि शक्ति के आदि स्वरुप (शिवलिंग ) से इस समस्त संसार की उत्पति हुई तथा उसका यह गोलाकार / सर्पिलाकार स्वरुप प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तथा प्राकृतिक अथवा कृत्रिम रूप से हमारे चारों और स्थित है।
1. हमारी आकाश गंगा
2. हमारी पडोसी अन्य आकाश गंगाएँ (पांच -सात -दस नही, अनंत है)
3. ग्रहों, उल्काओं आदि की गति (पथ)
4.ब्लैक होल की रचना
5. संपूर्ण पृथ्वी पर पाए गये सर्पिलाकार चिन्ह (ये अभी तक रहस्य बने हए हैँ ये हजारों की संख्या में हैँ, जिनमे से अधिकतर पिरामिडों से भी पुराने हैँ)
6. समुद्री तूफान
7. मानव डीएनए
8. मानव कुण्डलिनी (सर्पिलाकार / गोलाकार/ कुंडल के समान ) शक्ति का प्रतिरूप ।
9. जल धारा
10. जीवाश्म
11. परमाणु की संरचना
12. शंख की संरचना
13. समुद्री जीवोँ की गति
14. मकड़ी का जाला
15. वायु तूफान
16. प्रकृति
17. घोंघा
18. बम विस्फोट से निकली
ऊर्जा का प्रतिरूप ।
19. ब्रह्माण्ड में होने वाले दैनिक स्वविस्फोट
20. सरोवर में गिरी जल की बूंद का प्रतिरूप
21. लट
22. पुष्प
23. डीएनए की
न्युक्लियोटाइड संरचना ।
24. शिवलिंग
इस प्रकार की करोड़ोँ वृताकार संरचनाओं का सम्बन्ध "ॐ" से है
दोस्तों उपरोक्त वर्णन पूर्णतया सत्य है इसके अतिरिक्त आप शिवलिंग की कहीं और इसके विपरीत (गलत) व्याख्या देखते है तो वह पूर्णतया खोटी है,
षड्यंत्रकारियों के षड्यंत्र, सेकुलरोँ की मलेच्छ नस्ल, विधर्मियोँ के कुत्सित कार्यकलाप, मूर्खों की भ्रमित बुद्धि के प्रलाप तथापि चंद सैँकडों वर्ष पूर्व लोगोँ द्वारा चलाई गई मजहबी दुकानों की उन्नति हेतु सनातन धर्म पर कीचड़ उछालने का नाकाम प्रयास मात्र है। खैर ये तो देवों और असुरों का पुराना प्रेम है|
ॐ (ओ३म्)
ॐ ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। इसे अनहद भी कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है।
इस प्रणवाक्षर (प्रणव+अक्षर) भी कहते है प्रणव का अर्थ होता है तेज गूंजने वाला अर्थात जिसने शून्य में तेज गूंज कर ब्रह्माण्ड की रचना की।
वैसे तो इसका महात्म्य वेदों, उपनिषदों, पुराणों तथा योग दर्शन में मिलता है परन्तु खासकर माण्डुक्य उपनिषद में इसी प्रणव शब्द को बारीकी से समझाया गया है।
माण्डुक्य उपनिषद के अनुसार यह ओ३म् शब्द तीन अक्षरों से मिलकर बना है- अ, उ, म. प्रत्येक अक्षर ईश्वर के अलग अलग नामों को अपने में समेटे हुए है.
जैसे - “अ” से व्यापक, सर्वदेशीय, और उपासना करने योग्य है.
“उ” से बुद्धिमान, सूक्ष्म,सब अच्छाइयों का मूल, और नियम करने वाला है.
“म” से अनंत, अमर, ज्ञानवान, और पालन करने वाला है. तथा यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है।
आसान भाषा में निराकार ईश्वर को एक शब्द में व्यक्त किया जाये तो वह शब्द ॐ ही है
तपस्वी और योगी जब ध्यान की गहरी अवस्था में उतरने लगते हैँ तो यह नाद (ध्वनि) हमारे भीतर तथा बाहर कम्पित स्पष्ट प्रतीत होने लगती है।
साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है। फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णत: मौन और ध्यान में होना जरूरी है।
हाल ही में हुए प्रयोगों के निष्कर्षों के आधार पर सूर्य से आने वाली रश्मियों में "अ उ म" की ध्वनि होती है इसकी पुष्टि भी हो चुकी है।
ॐ को केवल सनातनियों के ईश्वरत्व का प्रतीक मानना उचित नही । जिस प्रकार सूर्य, वर्षा, जल तथा प्रकृति आदि किसी से भेदभावना नहीँ करती, उसी प्रकार ॐ, वेद तथा शिवलिंग आदि भी समस्त मानव जाती के कल्याण हेतु है। बशर्ते मलेच्छ उपद्रव न करेँ अन्यथा सनातन धर्म मेँ अधर्म के नाश हेतु युद्ध का प्रावधान भी किया गया है।
अगले लेख मेँ अनाहत नाद (ब्रह्म नाद) को विस्तार से समझाऊंगा।
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वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्स/धुरी (Axis) ही लिंग है।
The Whole Universe Rotates Through a Shaft Called Shiva Lingam.
हम जानते है की सभी भाषाओँ में एक ही शब्द के कई अर्थ निकलते है
जैसे: सूत्र के - डोरी/धागा, गणितीय सूत्र, कोई भाष्य, लेखन को भी सूत्र कहा जाता है जैसे नासदीय सूत्र, ब्रह्म सूत्र आदि |
अर्थ :- सम्पति, मतलब (मीनिंग), उसी प्रकार यहाँ लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है।
लिंग संस्कृत का शब्द है जिसके निम्न अर्थ है
त आकाशे न विधन्ते -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० ५ रूप ,रस ,गंध और स्पर्श :- ये लक्षण आकाश में नही है।
किन्तु शब्द ही आकाश का गुण है। "निष्क्रमणम् प्रवेशनमित्याकशस्य" लिंगम् -वै०। अ ० २ । आ ० १ ।सू ० २ ० जिसमे प्रवेश करना व निकलना होता है वह आकाश का लिंग है । अर्थात ये आकाश के गुण है।
"अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं क्षिप्रमिति काललिङ्गानि" ।-वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० ६
जिसमे अपर, पर, (युगपत) एक वर, (चिरम) विलम्ब , क्षिप्रम शीघ्र इत्यादि प्रयोग होते है , इसको काल कहते है , अर्थात ये काल के लिंग है।
इत इदमिति यतस्यद्दिश्यं लिंगम। - वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० १ ०
जिसमे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण , ऊपर व् निचेका व्यवहार होता है उसी को दिशा कहते है अर्थात ये सभी दिशा के लिंग है।
"इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञान
जिसमे (इच्छा) राग , (द्वेष) वैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ , सुख, दुःख, (ज्ञान) जानना आदि गुण हो , वः जीवात्मा हैये सभी जीवात्मा के लिंग अर्थात कर्म व् गुण है ।
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शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है।
स्कन्दपुराण में कहा गया है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा गया है तथा कई अन्य नामोँ से भी संबोधित किया गया है जैसे : प्रकाश स्तंभ / लिंग, अग्नि स्तंभ / लिंग, उर्जा स्तंभ / लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ / लिंग (Cosmic Pillar/Lingam)
ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और पदार्थ | हमारा शरीर पदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है|
इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते है |
ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा ऊर्जा शिवलिंग में निहित है. वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है. (The Universe is a Sign of Shiva Lingam.)
शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-अनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक भी है,
अर्थात् इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों समान हैँ।
अब जरा आईसटीन का सूत्र देखिये जिस के आधार पर परमाणु बम बनाया गया, परमाणु के अन्दर छिपी अनंत ऊर्जा की एक झलक दिखाई जो कितनी विध्वंसक थी सब जानते है। (E=mc2) {ई=एम सी स्क्वेयर} [एनर्जी और मैटर एक ही हैँ] (डिस्कवरी साइंस चैनल पर आने वाले क्रार्यक्रम "डार्क मैटर्स- ट्विस्टेड बट ट्रू" का "आइंसटीन रिवेँज" नामक एपिसोड इंटरनेट पर डाउनलोड करके देखेँ।)
इसके अनुसार पदार्थ को पूर्णतयः ऊर्जा में बदला जा सकता है। अर्थात् ये दो नहीँ एक ही हैँ, पर वो दो हो कर सृष्टि का निर्माण करते हैँ।
हमारे ऋषियो ने ये रहस्य सहस्त्रोँ साल पहले ही ख़ोज लिया था।
हमारे संतों/ऋषियों ने जो हमें वेदों और उपनिषदों का ज्ञान लिखित रूप में प्रदान किया है, उन्होंने कभी यह दावा नहीं किया कि यह उनका काम है। वे हर काम के अंत में स्वीकार किया कि वे हमें बता रहे हैं जो उन्हें अपने पूर्वजों द्वारा कहा गया है. यह सार्वभौमिक ज्ञान लगभग १३.७ खरब वर्ष पुराना हमें संस्कृत जैसी महान भाषाओँ में उपलब्ध होता है। यह किसी अन्य भाषा में पूर्णतया अनुवाद नही किया जा सकता । कम से कम अंग्रेजी जैसी कमजोर भाषा में तो बिलकुल नहीँ।
जैसे एक छोटा सा उदाहरण देता हूँ:-
आज गूगल ट्रांसलेटर http://translate.google.com/ में लगभग सभी भाषाओँ का समावेश है किन्तु संस्कृत का नहीँ, क्योकि संस्कृत का व्याकरण विशाल तथा दुर्लभ है।
आप कहेंगे कि संस्कृत इतनी इम्पोर्टेन्ट नहीँ इसलिए नही होगी, यदि इम्पोर्टेन्ट नहीँ तो नासा संस्कृत क्यों अपनाना चाहती है। और अपने नवयुवकों को संस्कृत सीखने पर जोर क्योँ दे रही है? (मेरी एरिया 51 वाली पोस्ट देखेँ)
ये लिँक खोलिए : http://hindi.ibtl.in/news/
श्री वार्ताक जी (वेद विज्ञान मंडल,पुणे) ने अपने लेख Shiva Lingam – A Symbol of Science में लिखा है की - जब कालांतर में ज्ञान के स्तर में गिरावट आई तब पाश्चात्य वैज्ञानिको ने वेदों/उपनिषदों तथा पुराणो आदि को समझने में मूर्खता की क्योकि उनकी बुद्धिमत्ता वेदों में निहित प्रकाश से साक्षात्कार करने योग्य नही थी।
ऐसा उदहारण हम हमारे दैनिक जीवन में भी देखते है जैसे परीक्षा के दिनों में अध्ययन करते समय जब कोई टॉपिक हमें समझ न आये तो हम कह दिया करते है की ये टॉपिक तो बेकार है।
जब की असल में वह टॉपिक बेकार नही अपितु उस टॉपिक में निहित ज्ञान का प्रकाश हमारी बुद्धिमत्ता से अधिक है।
इसे इस तरह भी समझ सकते है की 12 वोल्ट धारण कर सकने वाले विद्युत बल्ब में अगर घरों में आने वाले वोल्ट (240) प्रवाहित कर दिया जाये तो उस बल्ब की क्या दुर्गति होगी? उसका फिलामेंट तत्क्षण अविलम्ब उड़ जायेगा।
कुछ महान (?) पाश्चात्य विद्वानोँ ने तो वेदोँ को काल्पनिक तक बता डाला
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हम अपने दैनिक जीवन में भी देख सकते है की जब भी किसी स्थान पर अकस्मात् उर्जा का उत्सर्जन होता है तो ऊर्जा का फैलाव अपने मूल स्थान के चारों ओर एक वृताकार पथ में तथा उपर व निचे की ओर अग्रसर होता है अर्थात दशोँ दिशाओं (आठों दिशों की प्रत्येक डिग्री (360 डिग्री) + ऊपर व नीचे ) होता है,
फलस्वरूप एक क्षणिक शिवलिंग आकृति की प्राप्ति होती है
जैसे बम विस्फोट से प्राप्त ऊर्जा का प्रतिरूप , शांत जल में कंकर फेंकने पर प्राप्त तरंग (ऊर्जा) का प्रतिरूप जैसा होता है आदि ।
सृष्टि के आरम्भ में महाविस्फोट के पश्चात् ऊर्जा का प्रवाह वृत्ताकार पथ में तथा ऊपर व नीचे की ओर हुआ फलस्वरूप एक महाशिवलिंग का प्राकट्य हुआ जैसा की आप उपर्युक्त चित्र में देख सकते है|
जिसका वर्णन हमें लिंगपुराण, शिवमहापुराण, स्कन्द पुराण आदि में मिलता है की आरम्भ में निर्मित शिवलिंग इतना विशाल (अनंत) तथा की देवता आदि मिल कर भी उस लिंग के आदि और अंत का छोर या शाश्वत अंत न पा सके।
पुराणोँ में कहा गया है की प्रत्येक महायुग के पश्चात समस्त संसार इसी शिवलिंग में समाहित (लय) होता है तथा इसी से पुनः सृजित होता है ।
[उसी आदि शक्ति के आदि स्वरुप (शिवलिंग ) से इस समस्त संसार की उत्पति हुई तथा उसका यह गोलाकार / सर्पिलाकार स्वरुप प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तथा प्राकृतिक अथवा कृत्रिम रूप से हमारे चारों और स्थित है।
1. हमारी आकाश गंगा
2. हमारी पडोसी अन्य आकाश गंगाएँ (पांच -सात -दस नही, अनंत है)
3. ग्रहों, उल्काओं आदि की गति (पथ)
4.ब्लैक होल की रचना
5. संपूर्ण पृथ्वी पर पाए गये सर्पिलाकार चिन्ह (ये अभी तक रहस्य बने हए हैँ ये हजारों की संख्या में हैँ, जिनमे से अधिकतर पिरामिडों से भी पुराने हैँ)
6. समुद्री तूफान
7. मानव डीएनए
8. मानव कुण्डलिनी (सर्पिलाकार / गोलाकार/ कुंडल के समान ) शक्ति का प्रतिरूप ।
9. जल धारा
10. जीवाश्म
11. परमाणु की संरचना
12. शंख की संरचना
13. समुद्री जीवोँ की गति
14. मकड़ी का जाला
15. वायु तूफान
16. प्रकृति
17. घोंघा
18. बम विस्फोट से निकली
ऊर्जा का प्रतिरूप ।
19. ब्रह्माण्ड में होने वाले दैनिक स्वविस्फोट
20. सरोवर में गिरी जल की बूंद का प्रतिरूप
21. लट
22. पुष्प
23. डीएनए की
न्युक्लियोटाइड संरचना ।
24. शिवलिंग
इस प्रकार की करोड़ोँ वृताकार संरचनाओं का सम्बन्ध "ॐ" से है
दोस्तों उपरोक्त वर्णन पूर्णतया सत्य है इसके अतिरिक्त आप शिवलिंग की कहीं और इसके विपरीत (गलत) व्याख्या देखते है तो वह पूर्णतया खोटी है,
षड्यंत्रकारियों के षड्यंत्र, सेकुलरोँ की मलेच्छ नस्ल, विधर्मियोँ के कुत्सित कार्यकलाप, मूर्खों की भ्रमित बुद्धि के प्रलाप तथापि चंद सैँकडों वर्ष पूर्व लोगोँ द्वारा चलाई गई मजहबी दुकानों की उन्नति हेतु सनातन धर्म पर कीचड़ उछालने का नाकाम प्रयास मात्र है। खैर ये तो देवों और असुरों का पुराना प्रेम है|
ॐ (ओ३म्)
ॐ ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। इसे अनहद भी कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है।
इस प्रणवाक्षर (प्रणव+अक्षर) भी कहते है प्रणव का अर्थ होता है तेज गूंजने वाला अर्थात जिसने शून्य में तेज गूंज कर ब्रह्माण्ड की रचना की।
वैसे तो इसका महात्म्य वेदों, उपनिषदों, पुराणों तथा योग दर्शन में मिलता है परन्तु खासकर माण्डुक्य उपनिषद में इसी प्रणव शब्द को बारीकी से समझाया गया है।
माण्डुक्य उपनिषद के अनुसार यह ओ३म् शब्द तीन अक्षरों से मिलकर बना है- अ, उ, म. प्रत्येक अक्षर ईश्वर के अलग अलग नामों को अपने में समेटे हुए है.
जैसे - “अ” से व्यापक, सर्वदेशीय, और उपासना करने योग्य है.
“उ” से बुद्धिमान, सूक्ष्म,सब अच्छाइयों का मूल, और नियम करने वाला है.
“म” से अनंत, अमर, ज्ञानवान, और पालन करने वाला है. तथा यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है।
आसान भाषा में निराकार ईश्वर को एक शब्द में व्यक्त किया जाये तो वह शब्द ॐ ही है
तपस्वी और योगी जब ध्यान की गहरी अवस्था में उतरने लगते हैँ तो यह नाद (ध्वनि) हमारे भीतर तथा बाहर कम्पित स्पष्ट प्रतीत होने लगती है।
साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है। फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णत: मौन और ध्यान में होना जरूरी है।
हाल ही में हुए प्रयोगों के निष्कर्षों के आधार पर सूर्य से आने वाली रश्मियों में "अ उ म" की ध्वनि होती है इसकी पुष्टि भी हो चुकी है।
ॐ को केवल सनातनियों के ईश्वरत्व का प्रतीक मानना उचित नही । जिस प्रकार सूर्य, वर्षा, जल तथा प्रकृति आदि किसी से भेदभावना नहीँ करती, उसी प्रकार ॐ, वेद तथा शिवलिंग आदि भी समस्त मानव जाती के कल्याण हेतु है। बशर्ते मलेच्छ उपद्रव न करेँ अन्यथा सनातन धर्म मेँ अधर्म के नाश हेतु युद्ध का प्रावधान भी किया गया है।
अगले लेख मेँ अनाहत नाद (ब्रह्म नाद) को विस्तार से समझाऊंगा।
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